कहते हैं कि देवता स्वर्ग
में रहते हैं और दानव पाताल में। ये दोनों ही स्थान कहीं और नहीं हमारे शरीर में
मौजूद हैं। इसलिए देवता और दानव दोनों ही हमारे शरीर में रहते हैं। हमारे शरीर के
अंदर हर पल देवताओं और दानवों के बीच संघर्ष चल रहा है। दोनों ही हमारे शरीर और मन
पर अपना कब्जा बनाये रखने का प्रयास करते हैं।
जब हम मन में उठने वाले बुरे
विचारों को नकार देते हैं तो देवता जीत जाते हैं। लेकिन, जब बुराईयों को स्वीकार कर
लेते हैं तब देवता पराजित हो जाते हैं। समाज को सुधारने के लिए देवता कभी भी आसमान
से उतरकर नहीं आते हैं और न दानव धरती फाड़कर किसी का धन छीनने, मुस्कुराते चेहरों
को मौत की नींद सुलाने नहीं आता है।
हमारे बीच रहने वाले जो लोग मनावता की
भलाई के लिए काम करते हैं, गरीबों, दुखियों और कमज़ोरों की सहायता करते हैं उस
मनुष्य के शरीर में दानव सहमा हुआ बैठा रहता है और देवता प्रसन्न होकर विराजमान
रहते हैं। सामान्य मनुष्य जो देवता और दानव के युद्घ के बीच उलझे रहते हैं अर्थात्
अच्छाई और बुराई के बीच फंसे रहते हैं वह इन्हें ही भगवान मानकर राम, कृष्ण, बुद्ध,
महावीर तथा अन्य नामों से पूजा करते हैं।
रावण, कंश, हिरण्यकश्यपु,
हिरण्याक्ष भी मनुष्य रूप में थे। लेकिन इनके गुण और स्वभाव मानवता के विपरीत थे
इसलिए यह दानव और असुर कहलाते हैं। हर युग में देवताओं ने अर्थात सद्गुणों ने
दानवों अर्थात् दुर्गुणों को पाराजित किया है। हम सभी को प्रकृति के इस नियम का
पालन करना चाहिए और अपने अंदर बैठे दानव को सद्गुणों से पराजित करना चाहिए ताकि
हमारे शरीर में देवता सदैव मुस्कुराते रहें।