मंजुश्री एक बार बुद्ध के शिष्यों के पास गए और उनसे मिले। बुद्ध के शिष्य उनके आने तक रुके, लेकिन ज्यादा देर तक रुक नहीं सके। शिष्यों के ध्यान का समय हो गया था, इसलिए वे जल्दी ही तितर-बितर हो गए। मंजुश्री ने भी इस व्यवहार को सहज भाव से लिया। प्रसंगवश जान लेना जरूरी है कि मंजुश्री बौद्ध धर्म में बुद्धिमत्ता के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं। उन्हें बुद्ध का अवतार भी माना जाता है।
ध्यान में बैठे होने तक मंजुश्री भी समाधिस्थ से बैठे रहे। अंतेवासी साधकों ने धीरे-धीरे प्रत्यक्ष जगत से संपर्क किया। हालात यह बने कि विहार में सक्यमुनी और ध्यान में डूबी एक लड़की को छोड़कर कोई नहीं बचा, जो ध्यान से बाहर न आया हो। उस लड़की को, जिसका नाम वासंती था, इलाके में सर्वोच्च सम्मान मिल चुका था। ध्यान में ओत-प्रोत वासंती को देखकर कौतूहल में आकर मंजुश्री ने सक्यमुनि से सवाल किया कि आखिर यह लड़की ध्यान के सागर में इतने गहरे तक कैसे उतर जाती है! इतनी गहराई तक तो वह स्वयं भी नहीं उतर सके हैं।
सक्यमुनि ने जवाब दिया, उसको ध्यान से बाहर निकालकर खुद ही पूछ लो। इन शब्दों को ध्यान में रखते हुए मंजुश्री ने पहले आदर से लड़की की तीन बार परिक्रमा की। परिक्रमा लगाकर मंजुश्री ने चुटकी बजाकर उसे ध्यान से बाहर लाने की कोशिश की। वासंती स्थिर ही बैठी रही। मंजुश्री ने तब अपनी सारी संचित की हुई जादुई शक्तियों का आवाहन किया और वासंती को परलोक तक भी भेज दिया, पर कोई असर नहीं हुआ। दूसरे लोकों की यात्रा से लौट आने के बाद भी वासंती ध्यान की गहराई में अविचल बैठी रही।
अचानक एक अशिक्षित इंसान मोम्यो ने धरती के नीचे से एकाएक उत्पन्न होकर लड़की के ध्यान को भंग करने की कोशिश की। उसके चुटकी बजाते ही लड़की एक बार के लिए ध्यान से बाहर आ गई। मंजुश्री मौन देखते रहे। सक्यमुनि से फिर उन्होंने पूछा, यह कैसे हुआ? मुनि ने कहा, मोम्यो भी कुछ क्षण पहले इसी तरह ध्यान से उठा है। डूबे हुए व्यक्ति को वही जगा सकता है, जो खुद भी डूब चुका हो।