‘होली’ अर्थात् हो... ली...। जो हो गया उसे भूल जाओ। निंदा हो ली सो हो ली... प्रशंसा हो ली सो हो ली... तुम तो रहो मस्ती और आनंद में।
होली एक ऐसा अनूठा त्यौहार है जिसमें गरीब की संकीर्णता और अमीर का अहं दोनों किनारे रह जाते हैं। दबा हुआ मन एवं अहंकारी मन, दूषित मन और शुद्ध मन - इस दिन ये सारे मन ‘अमन’ होकर प्रभु के रंग में रँगने के लिए मैदान में आ जाते हैं।
जब वैदिक ढंग से होली मनायी जाती थी, उस जमाने में मानसिक तनाव, खिंचाव आदि नहीं होते थे किंतु आज जहरीले रंगों के प्रयोग, शराब आदि पीने-पिलाने एवं कीचड़ आदि उछालने से होली का रूप बड़ा विकृत हो गया है।
इसलिए होली के स्वास्थ्य हितकारी एवं ज्ञानवर्धक पहलू की ओर ध्यान देने की जरूरत है।
पलाश के फूलों से बने रंग का हमारे स्वास्थ्य पर अद्भुत प्रभाव पड़ता है। यदि इस रंग में रँगा हुआ कपड़ा भिगोकर शरीर पर डाल लिया जाय तो वह रंग शरीर के रोमकूपों द्वारा आंतरिक स्नायुमंडल पर अपना प्रभाव डालता है।
यह संक्रामक रोगों से रक्षा करता है। पलाश के फूलों का रंग कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्र कृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है।
ग्रीष्मकाल में हमारे शरीर में गर्मी बढ़ती है जिससे त्वचा के रोग, स्वभाव में खिन्नता व गुस्सा बढ़ सकता है। इन मानसिक रोगों से बचाव करने में पलाश के रंग की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
पलाश के फूलों का प्राकृतिक नारंगी रंग रक्तसंचार में वृद्धि करता है, मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक शक्ति व इच्छाशक्ति को बढ़ाता है।
होली देहाध्यास भूलने का एक तरीका था, लेकिन होली का ये उद्देश्य आजकल दब गया। देहाध्यास भूलने के लिए नेता और जनता की एकता, संत और साधक की एकता, सेठ और नौकर की एकता का, प्राकृतिक-नैसर्गिक जीवन जीने का एक दिन था, एक मौका था होली का दिन।
‘मैं’ और ‘मेरे’ के व्यवहार से जो बोझ महसूस होता है, वह बोझा उतारने का यह एक सुंदर कार्यक्रम था लेकिन इस होली में भी आजकल बोझा उतरता नहीं है बल्कि और बढ़ रहा है।
सामान्य दिनों में जो काम होता है त्यौहारों में और अधिक काम बढ़ा लेते हैं। होली के दिन सिनेमाघर पर भीड़ ज्यादा होगी। इन दिनों जितने मानसिक अपराध होंगे, उतने अन्य दिनों में नहीं होंगे क्योंकि हम व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहे हैं।
त्यौहारों की जो व्यवस्था थी जीवन को सरलता की, नैसर्गिकता की तरफ ले जाने की, अहंकार को विसर्जित करने की, त्यौहारों के द्वारा जो कुछ लाभ मिलता था वह समाज खोता आया है।
उत्सव मनाने के बाद भी हम परमात्मा के निकट न पहुँचें तो वह उत्सव वास्तव में उत्सव नहीं, वह त्यौहार त्यौहार नहीं, वह तो मौत का दिन है। जीवन का दिन तो वह है कि तुम ईश्वर के रास्ते पर एक कदम आगे बढ़ जाओ।
होली की रात्रि इस मार्ग पर बढ़ने का एक सुनहरा अवसर है। वर्ष की चार महारात्रियों में से एक होली की रात्रि को किये गये शुभ कर्म, साधन-भजन, जप, ध्यान कई गुना अधिक प्रभावशाली होते हैं।
बाह्य उत्सव तुम्हें ईश्वरीय उत्सव में ले जाय, ईश्वरीय ज्ञान, ईश्वरीय माधुर्य, ईश्वरीय दृष्टि, ईश्वरीय प्रेम में परितृप्त कर दे।
होली का उत्सव हमें यही पावन संदेश देता है कि हम भी अपने जीवन में आनेवाली विघ्न-बाधाओं के सिर पर नाचते हुए आगे बढ़ें। ‘ॐ उद्यम... ॐ साहस... ॐ धैर्य... ॐ बुद्धि... ॐ शक्ति... ॐ पराक्रम....’
गुनगुनाते हुए, पद-पद पर परमात्मा के सहयोग का फायदा उठाते हुए पार हो जायें सब परेशानियों से! इसलिए होली मनायें तो किसी पावन जगह पर मनायें, संत के संग मनायें ताकि जन्म-मरण की भटकान समाप्त हो जाय। आत्मज्ञान, आत्मविश्राम, आत्मतृप्ति...आप इरादा पक्का करो, बाकी भगवान पग-पग पर सहायता करते ही हैं, बिल्कुल पक्की बात है।
बाजार में मिलने में वाले केमिकल वाले रंगों से कई प्रकार के खतरनाक रोग हो सकते हैं। बापू जी बता रहे हैं अपने हाथों से कैसे बनाएं प्राकृतिक रंग
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।