आर्यमन एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था। वह बहुत मेहनती था, पर टीम के दूसरे सदस्यों की तुलना में कम पढ़ा-लिखा था, इसलिए उसे वेतन भी कम मिलता था। हालांकि उसका काम सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले सदस्य से भी अच्छा था। मैनेजर ने आर्यमन से वायदा किया था कि इस बार उसका वेतन बाकियों के वेतन के बराबर हो जाएगा। पर ऐसा नहीं हो पाया। हालांकि कंपनी में और किसी का वेतन नहीं बढ़ाया गया। फिर भी आर्यमन को दुख हुआ और कुछ दिन की छुट्टी लेकर वह दादी के पास चला गया। उसकी दादी तब खेत से आया गेहूं बोरियों में डाल रही थीं।
आर्यमन को मायूस देख उन्होंने पूछा, तुम क्यों इतने मायूस हो? आर्यमन ने दादी को पूरी कहानी बताई। दादी बोलीं, पर मेरे लिए तो तुम हमेशा अव्वल ही रहोगे। अच्छा बताओ, यहां गेहूं की कितनी बोरियां हैं? आर्यमन ने गिनकर कहा, दस हैं, पर इससे यह कैसे पता चलता है कि मैं पढ़ने में अच्छा हूं? दादी बोलीं, इन दस बोरियों में चालीस-चालीस किलो गेहूं भरा है। कुल मिलाकर कितना गेहूं हुआ? आर्यमन बोला, चार सौ किलो।
दादी बोलीं, कल्पना करो कि अब इस चार सौ किलो गेहूं को तुम्हें बाजार में बेचना है। पर रास्ते में कोई एक किलो गेहूं चुराकर भागने लगता है। क्या तुम बाकी का गेहूं छोड़ उसके पीछे भागने लगोगे? या फिर उसे जाने दोगे, और सतर्क रहोगे कि आगे कोई ऐसा न कर पाए? आर्यमन बोला, मैं सतर्क रहूंगा कि आगे कोई ऐसा न कर पाए, क्योंकि मेरे पास अब भी तीन सौ निन्यानबे किलो गेहूं बचा है।
दादी बोलीं, गेहूं की अलग-अलग बोरियों की तरह हमारी जिंदगी में भी अलग-अलग खुशियां, अलग-अलग मकसद होते हैं। मान लो कि एक खुशी न भी मिले, तो क्या उसके लिए तुम बाकी की खुशियों को देखना बंद कर दोगे? आर्यमन का चेहरा खुशी से खिल उठा।