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संसार में सभी हमारे अपने हैं: आशाराम बापू

Sat, 23 Feb 2013 11:45 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाः।
सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
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‘सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और किसी को भी किसी दुःख की प्राप्ति न हो।’ इस सिद्धांत पर आ जायें तो अशांति देखने को नहीं मिलेगी। क्या आप अपनी उँगली खराब देखना चाहते हो या आँख खराब देखना चाहते हो? क्या पैर खराब करना चाहते हो या पेट खराब देखना चाहते हो? जैसे आपका पूरा शरीर स्वस्थ हो तब आप स्वस्थ हैं, ऐसे ही ‘सभी के मंगल में मेरा मंगल है, सभी के स्वास्थ्य में मेरा स्वास्थ्य है, सभी की प्रसन्नता में मेरी प्रसन्नता है।’ - ऐसा एक-दूसरे के लिए सोचने लग जायें तो बुरे, क्रूर व्यक्तियों का भी मंगल हो जायेगा। जब हम उनको क्रूरता से देखेंगे तो वह हमें और क्रूरता से देखेंगे, ऐसे में मंगल नहीं हो सकता, अमंगल ही बढ़ेगा। आतंक से आतंक को मिटायेंगे तो आतंक बना ही रहेगा मिटेगा नहीं, क्या ख्याल है!

जो आपके प्रतिकूल है उसको लोहे चबवाने का मत सोचो, उसको खीर-खाँड़ खिलाने का सोचो तो आपके पास खीर-खाँड़ रहेगा। अपना भला चाहते हो तो दूसरों की भलाई कर लो, स्वास्थ्य चाहते हो तो स्वास्थ्य बाँटो, यश चाहते हो तो दूसरों को यश बाँटो, आप अमानी रहकर दूसरों को मान दो। आज यह पक्का करो कि अपने को जो अच्छा नहीं लगता वैसा व्यवहार दूसरों से नहीं करेंगे। मेरा मंगल हो ऐसा मैं चाहता हूँ तो मुझे ऐसा सोचना चाहिए कि सबका मंगल हो।
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आप जो अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए करो। एकत्व के ज्ञान से सुख-शांति बढ़ती है। एकत्व होते हुए भी अनेकत्व दिखे, यह उस कलाकार की सुंदर व्यवस्था है ताकि सब एक-दूसरे के काम आयें। स्त्री और पुरुष की अगर भिन्नता न होती तो वे एक-दूसरे के काम नहीं आते और सृष्टि नहीं हो सकती थी लेकिन भिन्नता होते हुए अभिन्नता में स्नेह भी तो होता है। ग्राहक की अपनी आवश्यकता है तो माल बेचने वाले की अपनी आवश्यकता है।

ग्राहक और माल बेचनेवाला भीतर से एक-दूसरे को हित की भावनाएँ दें तो वहाँ स्वर्ग बन जायेगा परंतु दुकानदार सोचता है कि ग्राहक अंधा हो जाय ताकि मैं उसे लूट लूँ। ग्राहक सोचता है दुकानदार भले भूखा मरे, मुझे सामान सस्ता मिले। नौकर चाहता है कि बिना मेहनत के पगार मिल जाय और पगार देनेवाला सोचता है कि कम पगार में इसका खून चूस लूँ। इसलिए अशांति और शोषण बढ़ता है। अहं को पोषना और दूसरे को शोषना, यह अशांति का फल है। अहं को विसर्जित करके आत्मभाव से सभी का मंगल चाहो तो अपना भी मंगल हो जाता है।

तुझमें राम मुझमें राम, तुझमें ॐ मुझमें ॐ, सबमें ॐ समाया है। कर लो सभीसे स्नेह जगत में कोई नहीं पराया है॥

इस ज्ञान का आदर होने पर सारे विश्व में सुख और शांति होगी। इस ज्ञान से जितना दूर होते हैं उतनी ही अशांति होती है। अपना बाहर का अहं मिटाकर वास्तविक ‘मैं’ में शांत होना और उसका महत्त्व समझना सारी समस्याओं का समाधान है। ॐ... ॐ... ॐ...

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
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गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।
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