पुण्य कमाने के लिए लोग क्या
नहीं करते हैं। शरीर को कष्ट देकर कई दिनों तक भूखे रहते हैं। घर छोड़कर पहाड़ों
जंगलों में ईश्वर को ढूंढने के लिए भटकते हैं। भगवान के नाम का कीर्तन और हवन करते
हैं लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं कि आपके द्वारा किये गये इन उपायों से ईश्वर
प्रसन्न हो जाएं और आपको पुण्य लाभ मिल जाए।
क्योंकि क्रिया में कुछ न कुछ
गलती हो सकती है जिससे आपके द्वारा किया गया प्रयास उद्देश्य को पूरा करने में असफल
भी हो सकता है। लेकिन एक सामान्य सा उपाय ऐसा है जो सभी क्रियाओं से ऊपर है। इस एक
क्रिया को सीख लें तो पुण्य का भंडार जमा हो जाएगा। यह क्रिया सबसे आसान है और
दैनिक जीवन में सभी कार्य करते हुए हर दिन पुण्य कमा सकते हैं। इसके लिए न तो किसी
तिथि की जरूरत है और न किसी शुभ समय की। इस क्रिया का नाम है 'परोपकार'।
महर्षि व्यास जी ने जब 18 पुराणों की रचना कर ली तब नारद जी को पुराणों का
अध्ययन करके इनका प्रचार प्रसार करने के लिए कहा। नारद जी ने कहा कि लंबे समय तक
बैठकर पुराण पढ़ना मेरी क्षमता से बाहर की बात है इसलिए संक्षेप में पुराणों का सार
बताइये। इस पर व्यास जी ने कहा "अष्टादशपुराणेशुव्यासस्यवचनद्वयम।
परोपकारायपुण्यायपापायपरपीडनम्॥" अर्थात सभी पुराणों का सार यही है कि दूसरों को
कष्ट पहुंचाना सबसे बड़ा पाप है और जरूरत में पड़े व्यक्ति की सहायता करना सबसे
बड़ा पुण्य है।
जो परोपकारी होते हैं उनका इस लोक में और परलोक में भी
सम्मान होता है। उदाहरण के तौर पर नदी को लीजिए यह बिना किसी स्वार्थ के अपना जल
सभी को जात-पात का भेद किये प्रदान करती है। यही कारण है कि नदियों की पूजा होती
है। परोपकारी व्यक्ति ईश्वर के समान हो जाता है लेकिन परोपकारी होने का अर्थ यह
नहीं है कि किसी स्वार्थ अथवा अहंकार से दूसरों की मदद करें। परोपकार निःस्वार्थ
होना चाहिए तभी परोपकार कहलाता है।