हजारों साल पहले हमें यह भी नहीं पता था कि शरीर कैसे काम करता है? अब हम उसे खोलकर देख चुके हैं, उसके साथ कई सारे काम भी कर चुके हैं। हमें इसके बारे में बहुत सी जानकारी है, लेकिन हम जितना ज्यादा जानने की कोशिश करते हैं, शरीर उतना ही ज्यादा रहस्यमयी होता जा रहा है। विज्ञान के बारे में लगता है कि वह जीवन में स्पष्टता लाता है, लेकिन आज आधुनिक विज्ञान ने बहुत से भ्रम पैदा कर दिए हैं।
आज आइंस्टीन, हैरी पॉटर से भी ज्यादा अतार्किक लगते हैं, क्योंकि वे बिल्कुल रहस्यमयी तरीके की बातें करते थे। हमारी समझ और तथाकथित ज्ञान जितना बढ़ता जाता है, जीवन उतना ही ज्यादा रहस्मयी होता जाता है। हम बस इतना ही कर रहे हैं कि अपनी अज्ञानता की सीमाओं को धक्का देकर उसे और बड़ा बना रहे हैं। आज विज्ञान कह रहा है कि ब्रह्मांड लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर ब्रह्मांड लगातार बढ़ रहा है, तो यह बढ़ कहां रहा है? यह एक राज है। बिल्कुल शून्य हुए बिना हम अपने अज्ञान की गहराई नहीं जान पाएंगे।
आत्म-ज्ञान का मतलब जानकारी हासिल करना नहीं, असीमित अज्ञान को छूना है। हर किसी के अज्ञान की कोई न कोई सीमा होती है। पर आत्म-ज्ञानी का अज्ञान असीम होता है, क्योंकि वह हर बंधन से मुक्त है। जब जिंदगी सीमित तरीकों से चलती है, तो हर चीज बिल्कुल साफ मालूम पड़ती है। लेकिन जब चीजें आपकी सीमाओं से परे होने लगती हैं, तो कुछ भी स्पष्ट नहीं रहता।
जो लोग किसी खास मार्ग पर हैं, जैसे-जैसे वह आगे बढ़ते हैं और ज्यादा भटका हुआ महसूस करने लगते हैं। जब बिल्कुल भटक जाते हैं और कहीं भी पहुंचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती, तो समझिए मकसद पूरा हो गया। जब कुछ पाने की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, तो सही मायनों में बिल्कुल ठीक होता है। जब आप अज्ञान की सभी सीमाएं पार कर लेते हैं और पूरी तरह से अज्ञानी बन जाते हैं, तब जानिए कि आप बिल्कुल ठीक हैं। पूर्ण रूप से अज्ञानी बनने का मतलब है कि आप खाली हो गए हैं और खालीपन ही वास्तव में अज्ञानता है।