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500 सोने के सिक्के दान करने के बाद आया मन में यह ख्याल, जानकर हैरान रह जाएंगे

Thu, 14 Jul 2016 12:41 PM IST
सनयात नान
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सोने के स‌िक्के
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जापान में तब बौद्धधर्म का प्रसार हो ही रहा था। लोग तेजी से बुद्ध की शिक्षाओं का अनुकरण कर रहे थे। वहीं कामाकुरा शहर के पास सिसेत्सू नामक मठ था। उस मठ के गुरु एन्गाकू जिस जगह पढ़ाते थे, वह बहुत संकुचित थी। नए विद्यार्थियों की संख्या और बढ़ती जाती थी। इसलिए दिनोंदिन महसूस होता कि ज्यादा जगह की जरूरत है। तभी उमेजा सेबी नाम का एक धनी व्यापारी आया। बौद्ध गुरु एन्गाकू के प्रति उसके मन में बड़ी श्रद्धा थी।
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उसने मठ और वहां साधना कर रहे छात्रों को देखा और गुरु के सामने मठ के विस्तार की योजना रखी। एन्गाकू ने सिर हिलाया और बिना बोले ही इस पहल का स्वागत किया। उमेजा सेबी ने मठ का आकार बढ़ाने और एक बड़ा विहार बनाने के लिए 500 स्वर्ण मुद्राएं, जिसे रयो कहते थे, देने का फैसला किया। यह रकम दानस्वरूप थी। उसने मुद्राएं गुरु को सौंप दी। एन्गाकु ने उन्हें एक तरफ रखने का इशारा किया और कहा, ठीक है। मैं इन्हें ले लूंगा।

उमेजू ने गुरु को सोने का थैला दिया, पर शिक्षक के रुख से वह खुश नहीं था। उन्होंने उमेजू को धन्यवाद तक नहीं कहा था। उमेजा सोचता था कि एक रयो अर्थात स्वर्णमुद्रा से एक व्यक्ति आराम से एक साल गुजारा चला सकता है। मैंने तो पांच सौ मुद्राएं दी हैं। इतना स्वर्ण मिलने के बाद भी गुरु के चेहरे पर धन्यवाद का बोध तक नहीं उभरा। उलटे वह बेरूखी जता रहा है। उमेजू ने गुरु को चेताने की कोशिश की।
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उसने कहा, इस थैले में 500 रयो हैं। एन्गाकु ने इसके जवाब में कहा, तुम मुझे यह पहले ही बता चुके हो। इस पर उमेजू ने कहा कि भले ही मैं एक धनी व्यापारी हूं , लेकिन 500 रयो बड़ी रकम होती है। एन्गाकु ने यह सुनकर कहा, क्या तुम चाहते हो कि मैं इसके लिए तुम्हें धन्यवाद करूं? जबकि तुम्हें मठ का आभारी होना चाहिए कि तुम्हें दान का मौका मिला?
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