अपने आस-पास आपको बहुत से ऐसे
लोग मिल जाएंगे जो अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों का ढ़िढ़ोरा पिटते नज़र आएंगे। आप
सुनना न भी चाहें तब भी आपको बताए बिना नहीं छोड़ेंगे कि मैंने ऐसा किया, मैने वैसा
किया। अगर मैं नहीं होता तो उस व्यक्ति का जाने क्या हो जाता।
वहीं आपको
कुछ ऐसे व्यक्ति भी मिलेंगे जो लोगों की सहायता करके, बड़ी से बड़ी उपलब्धियां
हासिल करके भी मौन रहते हैं। वास्तव में अपनी उपलब्धियों पर भी मौन रहने वाले संत
और देवतुल्य होते हैं।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मैं संसार का
कर्ता होकर भी सदैव अकर्ता बना रहता हूं। कर्ता होकर भी अकर्ता बने रहने के कारण ही
भगवान का मान है। अगर भगवान भी मनुष्य की तरह अपने कार्य का ढ़िंढ़ोरा पिटने लगें
तो उनका सम्मान भी खत्म हो जाएगा।
हम मनुष्य को भी गीता के इस ज्ञान को
अपने अंदर समाहित करना चाहिए और सदैव कर्म करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। जो लोग
अपने किये कर्म की कथा बांचने में लगे रहते हैं उनकी प्रगति वहीं रूक जाती है
क्योंकि वह अपनी छोटी सी उपलब्धि से प्रसन्न होकर उसी में मस्त हो जाते हैं। भगवान
के अकर्ता बने रहने के कारण ही यह संसार युगों-युगों तक अनवरत चलता रहता है।