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प्रवचन और कथा सुनने से बढ़िया खुद पुस्तक पढ़ना कितना फायदेमंद?

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यदि आत्मबोध से उत्पन्न प्रकाश ज्योति को स्थिर रखना हो तो उस दीपक में स्वाध्याय का तेल निरन्तर डालते रहना चाहिए। यह तेल जब तक पड़ता रहेगा तब तक उसके बुझने की आशंका न रहेगी। एक बार भावावेश में बहुत कुछ सोच डाला और आदर्शवाद की उड़ान उड़ ली, पर उस उमंग को नियमित परिपोषण न मिला तो हवा के साथ उड़ने वाले बादलों की तरह वह जोश आवेश भी कुछ समय में तिरोहित हो जायेगा।
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तब अपनी प्रतिज्ञा न निभ सकने की, इच्छा के कार्यान्वित न होने की कमजोरी निश्चित ही अपने रहे बचे मनोबल को भी तोड़ देगी और आगे फिर उन दिव्य आकांक्षाओं को पुनर्जीवित करना भी कठिन हो जाएगा। इस स्थिति से बचने के लिए प्रत्येक आदर्शवादी को स्वाध्याय को अपना जीवनसाथी एवं अभिन्न सहचर बना लेना चाहिए।

स्वाध्याय भी आजकल एक रूढ़ि बन गई है। कथा-पुराणों की पुस्तकों को बार-बार उलटते-पलटते रहने का नाम स्वाध्याय कहलाता है और आमतौर से लोग इसी लकीर को पीटकर आत्म प्रवञ्चना कर लेते हैं। स्वाध्याय उन्हीं पुस्तकों का होना चाहिए जो आज की उलझनों से भरे हुये मनुष्य को बुद्धि संगत और व्यावहारिक मार्गदर्शन कर सके।
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इस तरह का प्रखर साहित्य यों बहुत ही कम मात्रा में मिलता है। पर उसका सर्वथा अभाव नहीं है। तलाश करने पर वह अपने आसपास भी मिल सकता है। स्नान, भोजन, शयन आदि की ही तरह स्वाध्याय को भी अन्तःकरण की एक महती आवश्यकता मानना चाहिए और इस आत्मिक भोजन को जुटाने के लिए समय और पैसा निकालना चाहिए।
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संतसंग में आखिर सुनने को मिलता क्या है

स्वाध्याय का प्रयोजन महामानवों द्वारा लिखित जीवन विद्या के समग्र स्वरूप पर प्रकाश डालने वाले साहित्य को पढ़ने से ही पूरा होता है। उसका एक दूसरा पक्ष है, उसे सत्संग कहते हैं। अशिक्षित व्यक्ति सत्संग से ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। वे दूसरे की आँखों से ग्रन्थों को पढ़ाकर कानों से सुनते रहें तो भी वह आवश्यकता पूरी हो जाती है।

कभी-कभी सुलझे हुये विचारों के और परिष्कृत दृष्टिकोण सम्पन्न व्यक्ति परामर्श एवं प्रवचन के लिये भी उपलब्ध हो जाते हैं। पर यह उपलब्धि सदा सम्भव नहीं। धर्म और अध्यात्म के नाम पर जहाँ-तहाँ कूड़ा-कचरा ही बिखरा पड़ा है। मूढ़ता, अन्ध श्रद्धा, अत्युक्ति और असम्मति से भरे हुये विचार ही अक्सर सत्संग के नाम पर सुनने को मिलते हैं।

विक्षिप्त एवं सनकी स्तर के लोग एकाकी बातें सुनाकर अक्सर सुनने वाले को और अधिक उलझन में डाल देते हैं। सही सत्संग भी आज की परिस्थिति में यदा-कदा ही किसी को मिल सकता है। तो उसका उपयोग भी करना चाहिये और जो सुना या बताया गया है, उसमें से जो उपयोगी तत्व हो, उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।

(गायत्रीतीर्थ शान्तिकुञ्ज)
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