यदि आत्मबोध से उत्पन्न प्रकाश ज्योति को स्थिर रखना हो तो उस दीपक में स्वाध्याय का तेल निरन्तर डालते रहना चाहिए। यह तेल जब तक पड़ता रहेगा तब तक उसके बुझने की आशंका न रहेगी। एक बार भावावेश में बहुत कुछ सोच डाला और आदर्शवाद की उड़ान उड़ ली, पर उस उमंग को नियमित परिपोषण न मिला तो हवा के साथ उड़ने वाले बादलों की तरह वह जोश आवेश भी कुछ समय में तिरोहित हो जायेगा।
तब अपनी प्रतिज्ञा न निभ सकने की, इच्छा के कार्यान्वित न होने की कमजोरी निश्चित ही अपने रहे बचे मनोबल को भी तोड़ देगी और आगे फिर उन दिव्य आकांक्षाओं को पुनर्जीवित करना भी कठिन हो जाएगा। इस स्थिति से बचने के लिए प्रत्येक आदर्शवादी को स्वाध्याय को अपना जीवनसाथी एवं अभिन्न सहचर बना लेना चाहिए।
स्वाध्याय भी आजकल एक रूढ़ि बन गई है। कथा-पुराणों की पुस्तकों को बार-बार उलटते-पलटते रहने का नाम स्वाध्याय कहलाता है और आमतौर से लोग इसी लकीर को पीटकर आत्म प्रवञ्चना कर लेते हैं। स्वाध्याय उन्हीं पुस्तकों का होना चाहिए जो आज की उलझनों से भरे हुये मनुष्य को बुद्धि संगत और व्यावहारिक मार्गदर्शन कर सके।
इस तरह का प्रखर साहित्य यों बहुत ही कम मात्रा में मिलता है। पर उसका सर्वथा अभाव नहीं है। तलाश करने पर वह अपने आसपास भी मिल सकता है। स्नान, भोजन, शयन आदि की ही तरह स्वाध्याय को भी अन्तःकरण की एक महती आवश्यकता मानना चाहिए और इस आत्मिक भोजन को जुटाने के लिए समय और पैसा निकालना चाहिए।