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वो सौतेली थी, पर मां कहने से खुद को रोक नहीं पाई

Sat, 25 Nov 2017 09:11 AM IST
नीलम सक्सेना 'जयद', बरेली 
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मम्मी के गुजरने के बाद, पापा के बुलाने के आग्रह को मैं हमेशा ही टाल देती थी, क्योंकि पापा ने दूसरी शादी कर ली थी। वह भी इस उम्र में, अपने रिटायरमेंट के बाद। मैं उस घर में जाना ही नहीं चाहती थी, क्योंकि अभी भी मम्मी की सजीव यादें मेरे मन में ज्यों-की-त्यों रची-बसी थीं। मैं अपनी मम्मी की जगह किसी को नहीं दे सकती थी, किसी को भी नहीं।
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इस बार पापा की बीमारी का सुनकर स्वयं को रोक नहीं पाई। लेकिन वापिसी का टिकट भी साथ में लेकर मात्र एक दिन के लिए चल पड़ी, पापा से मिलने। पूरे रास्ते यही सोचती रही कि घर में सब कुछ बदल गया होगा। मम्मी की फोटो या फिर अन्य किसी चीज का तो नामोनिशां तक नहीं होगा...। घर में प्रवेश करते ही पापा के साथ उन्होंने मतलब पापा की नई पत्नी ने भी पूरी गर्मजोशी के साथ मेरा स्वागत किया।

मम्मी की फोटो के साथ-साथ जो  चीजें मम्मी जहां रखती थीं, वह वहां वैसी की वैसी वहीं रखी हुई थी। ऐसा लग रहा था, जैसे इस घर को अभी भी मम्मी की प्रतीक्षा हो और जब पूजा घर में लगी हुई मम्मी की एक बड़ी-सी फोटो को दिखाते हुए उन्होंने  कहा, 'मैंने तो दीदी को हर समय, हर काम में आगे माना, समझा।' और यह कहते हुए उनकी आंखें छलक गईं, कंठ रुंध गया।
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तब मैं भी उन्हें ‘मां’ कहने से स्वयं को नहीं रोक पाई। मां कहते हुए, मैं उनके गले से लग गई। मां ने प्यार से सिर पर हाथ रखते हुए कहा, 'बेटा विधाता के विधान को कोई नहीं बदल सकता, परंतु एक-दूसरे का सहारा बनकर जीवन को सुगम तो बना ही सकते हैं।' उस दिन से सौतेली मां के प्रति जो गलतफहमी थी, वह दूर हो गई। 
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