इंसान पैदायशी अंतरिक्ष यात्री होते हैं। इंसान अपने पैरों पर चलना सीखने से पहले आकाश की तरफ देखना शुरू करता है। आकाश हमेशा दिखता एक जैसा हो, लेकिन इसके मायने हमेशा बदलते रहे हैं। जब भारतीय संदर्भ में खगोल विज्ञान और संस्कृति के आपसी संबंधों को देखते हैं, तो सांस्कृतिक लिहाज से खगोल विज्ञान पर भारत में अभी भी वेद और पौराणिक साहित्यों का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। हालांकि प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान के साथ एक दिलचस्प बात यह है कि इसकी गणनाओं और आधुनिक वैज्ञानिक गणनाओं में काफी साम्य नजर आता है। हालांकि इसकी आलोचना भी की जाती है कि ज्यादातर प्राचीन भारतीय ज्ञान संस्कृत कविता के रूप में है, जिसमें अर्थ बेहद धुंधले और अस्पष्ट हैं। लिहाजा, जब आधुनिक विज्ञान और खगोल विज्ञान की गणनाएं सामने आती हैं, तो इन प्राचीन कथानकों को नए तरीके से परिभाषित करना आसान होता है। ज्यादातर प्राचीन सभ्यताओं में आकाश दैवीय और चमत्कारी सत्ताओं का ठिकाना माना जाता था। लेकिन, अब हम इसे वस्तुनिष्ठ तरीके से समझने लगे हैं। यह बात हमें माननी होगी कि आधुनिक वैज्ञानिक गण्ानाओं और सैद्धांतिक विकास से काफी पहले प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान में अंतरिक्ष की विशालता को स्वीकारने की साहस, अकल्पनीय दूरियों की लगभग सटीक गणनाएं और केप्लर से काफी पहले सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण का सटीक अनुमान लगाने की क्षमता थी।
वैदिक खगोल ज्ञान की जब पड़ताल करते हैं, तो ऋग्वेद में इसका बहुत छिट-पुट जिक्र देखने को मिलता है। जाहिर है यह आधुनिक विज्ञान के नजरिए से दिखाई नहीं देता, इसकी बड़ी वजह यह है कि खगोल विज्ञान वैदिक साहित्य में प्राथमिक विषय नहीं था, बल्कि खगोलीय गणनाएं व खगोलीय ज्ञान उन कर्मकांडों और रीतियों से जुड़े थे, जिनका वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। यजुर्वेद में कर्मकांडों की कार्यवाही के तरीके दिए गए हैं। इन कार्यवाहियों में दैवीय सहयोग जरूरी होता था, जिसके लिए सटीक खगोलीय गणनाएं जरूरी होती थीं।
वैदिक साहित्य में सिर्फ वेदांग ज्योतिष ही एक मात्र ऐसा दस्तावेज है, जो पूरी तरह से खगोल विज्ञान को समर्पित है। हालांकि, इसमें भी लगातार बदलाव हुए हैं, लेकिन यह ईसा से करीब 1400 वर्ष पुराना है। हालांकि, इसमें सिर्फ सूर्य और चंद्रमा की गतियों के बारे में वर्णन है। यानी मोटे तौर पर वैदिक खगोल विज्ञान रीति-रिवाजों के इर्द गिर्द घूमता है। लेकिन समय के साथ हमारे रीति-रिवाज जड़ होते गए और वैदिक काल गणनाओं में खो गए। हालांकि, आखिर में हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि प्राचीन खागोलीय ज्ञान का विज्ञान पर सीधा असर पड़ा था। सूर्य सिद्धांत में बताई गई खगोलीय गणनाएं और विधियां मौजूदा खागोल विज्ञान की गणनाओं से काफी हद तक मिलती-जुलती नजर आती हैं। लेकिन इससे हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते कि वैदिक दस्तावेज वैज्ञानिक दस्तावेज थे। हालांकि, वैदिक दस्तावेजों में कई सटीक वैज्ञानिक तथ्य मिलते हैं, जो विज्ञान को प्रभावित करते हैं।