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गुरू की कृपा से ही कल्याण संभव हैः आशाराम बापू

Fri, 25 Jan 2013 06:02 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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गुरुकृपा हि केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्। गुरु की कृपा ही शिष्य का परम मंगल कर सकती है, दूसरा कोई नहीं कर सकता है यह प्रमाण वचन है। प्रमाण वचन को जो पकड़ता है वह तरता है। जो मन के अनुसार, वासना के अनुसार ही गुरु को देखना चाहता है वह भटक जाता है। ‘शास्त्रानुसारी’ प्रमाण के अनुरूप करेगा। ‘वासना अनुसारी’ मन के अनुरूप करेगा।
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वासना अनुसारी कर्म बंधन है, संसार है, जन्म-मरण का कारण है और शास्त्रानुसारी कर्म उन्नति व ईश्वरप्राप्ति का साधन है। तो पुरुषार्थ क्या करना है ? जैसा मन में आये ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिए कि जैसा शास्त्र और गुरु कहते हैं वैसा करना चाहिए ? मान्यता अनुसारी कर्म कितने भी कर लो और उनका फल कितना भी दिख जाय लेकिन होगा वह संसारी।

जैसे सूर्य पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है - यह प्रमाणभूत बात है। आँखों को नहीं दिखता है फिर भी मानना पड़ेगा। आकाश में नीलिमा आँख को दिखती है लेकिन प्रमाणित है कि नीलिमा नहीं है तो मानना पड़ेगा नीलिमा नहीं है, हमारी आँख की कमजोरी से दिखती है। जो प्रमाणित बात है वह माननी पड़ती है। शास्त्र कहते हैं: गुरुकृपा हि केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्। यह प्रमाणित बात है। नानकजी कहते हैं: घर विच आनंद रह्या भरपूर, मनमुख स्वाद न पाया। अपने घर में ही ब्रह्म परमात्मा का आनंद है लेकिन जो मन के अनुसार ही करना चाहते हैं, वे उसको नहीं पा सकते। यह प्रमाणित बात है।
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कर्म किये बिना ईश्वर मिलता तो यूँ तो सबको मिल जाय ईश्वर! आस्तिक तो बहुत लोग हैं, श्रद्धालु तो बहुत लोग हैं, फिर उनको अल्लाह, गॉड या ईश्वर क्यों नहीं मिलता? गुरु के द्वार पर कई लोग आते हैं परंतु उनमें से जिनमें ईश्वरप्राप्ति की सच्ची लगन होती है वे गुरु के दैवी कार्यों में, शास्त्रानुसारी कर्मों में तत्परता से लगे रहते हैं और परम लक्ष्य को पा लेते हैं।

अपने मन में जैसा आया वैसा निर्णय करके जीव संसार-सागर में बह जाता है। अतः वासना अनुसारी कर्म संसार में भटकाता है और प्रमाण अनुसारी कर्म मोक्ष का हेतु है। अच्छा तो वही लगेगा जो अपने अनुकूल मिल जाय। व्यक्ति अपने विचारों के अनुसार करने लग जाय तो गिरेगा, पतन होगा और गुरु के अनुरूप छलाँग मारी तो उत्थान होगा। अपनी मान्यता के अनुसार एक जन्म नहीं हजार जन्म जियो, कर-करके गिर जाते हैं इसीलिए बोलते हैं शास्त्र के अनुसार कर्म करो।

रामकृष्णदेव ने अपनी मान्यता के अनुसार काली माता को तो प्रकट कर लिया लेकिन काली माता ने कहा : ‘ब्रह्मज्ञानी गुरु की शरण जाओ ।’
नामदेवजी ने अपनी मान्यतानुसार भगवान विट्ठल को प्रकट कर लिया लेकिन विट्ठल ने कहाः ‘विसोबा खेचर के पास जाओ।’ भगवान शिव को पार्वतीजी ने अपनी मान्यता के अनुसार पति के रूप में पा लिया लेकिन शिवजी ने कहा: ‘गुरु वामदेवजी की शरण जाओ।’ यह क्या रहस्य है ? प्रमाणभूत है कि गुरुकृपा हि केवलं... प्रमाणभूत बात माननी पड़ेगी!

मेरी हो सो जल जाय, तेरी हो सो रह जाय। हमारी जो अहंता, ममता और वासना है वह जल जाय। गुरुजी! आपकी जो करुणा और ज्ञानप्रसाद है वही रह जाय। तत्परता से सेवा करते हैं तो आदमी की वासनाएँ नियंत्रित हो जाती हैं और ईश्वरप्राप्ति की भूख लगती है। प्रमाणभूत है कि जगत नष्ट हो रहा है। संसार का कितना भी कुछ मिल जाय लेकिन परमात्म-पद को पाये बिना इस जीवात्मा का जन्म-मरण का दुःख जायेगा नहीं। बिनु रघुवीर पद जिय की जरनी न जाई। जो प्रमाणभूत बात है उसको पकड़ लेना चाहिए और जीवन सफल बनाना चाहिए।

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से  सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं। 
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