विदेश के मनीषियों ने, बड़े-बड़े विद्वानों ने, अच्छे-खासे ‘इंटेलिजेंट’
कहलानेवाले लोगों ने यह स्वीकार किया कि भारत का तत्त्वज्ञान, फिलासफी, भारतीय
दर्शन समझ में तो आ जाता है कि एक ही सत्ता है, अनेक अंतःकरणों में और अनेक
वस्तु-व्यक्तियों में वह एक ही परमात्मा है।
उसके अनेक-अनेक नाम और रूप हैं। यह समझ
में तो आ जाता है, लेकिन हिन्दुस्तानियों के पास यह कौन-सा मेथड है कि जो
सर्वव्यापक है, सर्वेश्वर है, परमेश्वर है, उसको नन्हा-मुन्ना बच्चा बना देते हैं,
छछिया भर छाछ पर नचा देते हैं। ‘हाय सीते !... हाय लखन!...’ करके रोने की लीला करवा
देते हैं, सखा बना देते हैं? जो परात्पर ब्रह्म है उसे अर्जुन का रथ चलानेवाला कैसे
बना देते हैं? हिन्दुस्तानियों के पास यह कौन-सा मेथड है? विदेशी दार्शनिकों के दिल
में यह गुत्थी बड़ी गहरी है।
‘पार्लमेंट ऑफ वर्ल्ड रिलिजन्स’ में यह सवाल
मुझसे पूछा गया था कि, बताओ हिन्दुस्तानी! ‘‘इंडिया में भगवान के अवतार क्यों होते
हैं?’’ मैंने पूछा: ‘‘जहाँ बारिश होती है वहाँ वृक्ष क्यों होते हैं और जहाँ वृक्ष
होते हैं वहाँ बारिश क्यों होती है?’’ बोले: ‘‘यह कुदरत का नियम है।’’ मैंने कहा:
‘‘ऐसे ही जहाँ भक्त होते हैं वहाँ भगवान आ जाते हैं और जहाँ भगवान होते हैं वहाँ
भक्त आ जाते हैं।’’
यह मेथड-वेथड कुछ नहीं है। यहाँ की भूमि पर भगवद्अवतार
हुए शिवजी की परम्परा से, भगवान नारायण और ऋषियों की परम्परा से। यहाँ नश्वर शरीर
की आसक्ति कम करके भाव और प्रेम विकसित हो ऐसी उपासना और साधना पद्धति है। तो जहाँ
भाव और प्रेम होता है वहाँ महाराज! पशु भी वश हो जाते हैं, पक्षी भी वश हो जाते
हैं, मनुष्य भी वश हो जाते हैं और पत्थर भी पिघल जाते हैं तथा पत्थर से देव भी
प्रकट हो जाते हैं। भक्तों की भावना और प्रेम से विश्वनियंता भी नन्हा-मुन्ना बालक
होकर लीला करने को तैयार हो जाता है।
हिन्दू धर्म की विशेषता है कि उसकी
मंत्रशक्ति, उपासना की पद्धति अपने में महान विशेषताएँ सँजोये हुए है। कई प्रकार के
योग- लययोग, कुंडलिनी योग, नादानुसंधान योग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, टंक विद्या,
आत्मविद्या, कर्मविद्या, भगवद्विद्या... अब कहाँ तक विस्तार करें? इस हिन्दू धर्म
की महिमा अपरंपार है! इसकी पद्धति से साधन-भजन करे तो मनुष्य में छुपी अलौकिक
शक्तियाँ विकसित होती हैं। अभी तो केवल लाखवाँ हिस्सा विकसित हुआ है।
भगवान
व्यापक हैं। जब चाहे, जहाँ चाहे, जैसे चाहे अपने प्रेमी, भावुक भक्त के आगे लीला
करने के लिए, प्रेरणा देने के लिए प्रकट हो सकते हैं। भगवान के अवतार अर्थात् केवल
कृष्ण अवतार हुआ, राम अवतार हुआ ऐसा मत समझो; भगवान के नित्य, नैमित्तिक, प्रेरणा,
आवेश और प्रवेश अवतार होते रहते हैं। जैसे जब दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र खींचने लगा
तब द्रौपदी खूब विह्वल हो गयी और उसने भगवान को पुकारा: ‘द्वारिकाधीश!’ तो उनका
साड़ी में प्रवेश अवतार हुआ। ऐसे ही प्रह्लाद को सताया गया और भगवान नरसिंह का आवेश
अवतार हुआ। बढ़िया काम करते हैं तो अंतर्यामी प्रभु आपको प्रेरणा देते हैं कि यह
उचित है, यह अनुचित है। यह करो, यह न करो। यह प्रेरणा अवतार है।
तात्पर्य
यह कि कोई बड़ा मेथड-वेथड नहीं है। आप प्रेम किये बिना नहीं रह सकते लेकिन जब नश्वर
चीजों को प्रेम करते हैं तो मोह हो जाता है और शाश्वत परमात्मा को प्रेम करते हैं
तो वह प्रेम परमात्मा हो जाता है। भारतवासी बोलते हैं: ‘भगवान मेरे हैं, भगवान
गोविंद हैं, भगवान गोपाल हैं, भगवान अच्युत हैं, भगवान दामोदर हैं, माता की गहराई
में मेरे प्रभु, पिता की गहराई में प्रभु... त्वमेव माता च पिता त्वमेव...’ इस
प्रकार की प्रेमाभक्ति और दृढ़ भावना ही निराकार ब्रह्म को साकार, नाचने-खेलने और
हँसने-रोने वाला बना देती है। अहं भक्त पराधीनो... भक्तिभाव से भगवान भक्त के अधीन
हो जाता है। जैसे बच्चे के प्रेम से माँ-बाप, दादा-दादी, पड़ोसी- सभी वश हो जाते
हैं।
प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा चहो प्रजा चहो, अहं
दिये ले जाय॥
ज्यों-ज्यों अहं गलता है और भगवान की महत्ता व अपने शरीर की
नश्वरता समझ में आती है तथा भगवान की करुणा-कृपा स्वीकार होने लगती है, त्यों-त्यों
भगवान का सद्भाव, भगवान का प्रेम, भगवान का आश्रय प्रकट होने लगता है। उस प्रेम और
भाव के बल से परात्पर परब्रह्म लीला करने को अवतरित हो जाता है।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत
श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी
अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध
प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी
सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक
आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के
सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन
करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क
सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व
समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व
ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की
कला सिखाते हैं।