येषां त्वन्तगतं पापं
जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
भगवान
बोलते हैं: "येषां त्वन्तगतं पापं..." अर्थात जिनके पापों का अंत होता है, "जनानां
पुण्यकर्मणाम्।" यानी जिनके पुण्य जोर मारते हैं, "ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः..."
वे द्वन्द्व और मोह से मुक्त होकर "भजन्ते मां दृढव्रताः।" अर्थात सत्संग में,
साधना में, ईश्वरप्राप्ति में लगते हैं।
बाकी के जो तुच्छ लोग हैं उनके लिए
भगवान ने ‘गीता’ में कहा- जन्तवः। जैसे जीव-जंतु खाते-पीते, बच्चे पैदा करते और फिर
मर जाते हैं, उनको पता ही नहीं कि इतना मूल्यवान जीवन कैसे बिताना चाहिए, ऐसे लोगों
को भगवान ने जन्तवः कहकर उपेक्षा करके एक प्रकार की गाली दी है। तेन मुह्यन्ति
जन्तवः। वे जंतु हैं, मोहित हो रहे हैं। ‘भागवत’ में आया है: मन्दाः सुमन्दमतयः...
ऐसे लोग मंदमति के हैं, मन्दभाग्याः भाग्य भी उनका मंद है, उपद्रुताः इसकी निंदा,
उसकी चुगली करने के उपद्रवी स्वभाव के हैं। कलियुग के दोषों से भरे हुए मनुष्य की
पहचान कराते हैं भगवान और सत्शास्त्र।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या
ह्युपद्रुताः। वे मंदमति हैं, मंदभागी हैं और उपद्रवी हैं। खुद तो उपद्रवी हैं और
दूसरों को भी ऐसे-वैसे साजिश करके, अफवाह फैलाकर उपद्रवों की आग में झोंकते हैं। जब
महापुरुष हयात होते हैं तो बोलते हैं: उल्टा मार्ग दसेंदा नानक। नानकजी के विरुद्ध
बगावत करते हैं। नानकजी जैसे महान संत को कारागार में डालने वाले ऐसे अभागे लोग
पीछे नहीं हटा करते। उसमें भी अपने को बड़ा आदमी साबित करते हैं कि देखो, इनके गुरु
बड़े कि मैं बड़ा हूँ। नानकजी को कारागार में डाल दिया बाबर ने, ऐसी बेकदरी की लोगों
ने नानकजी की। तो ये मंदमति हैं। जिनकी मति मारी गयी है वे संतों की हयाती में
संतों का फायदा नहीं ले पाते हैं अपितु संतों में दोष दर्शन करते हैं।
हयात
गुरु जब समाज में होते हैं तो लोग अवज्ञा करते हैं, उनके लिए कुछ-की-कुछ अफवाहें
करते हैं, निंदा आदि करते हैं, जिससे हयात गुरु से लोग वंचित हो जाते हैं, कम फायदा
उठा पाते हैं। भगवान के मंदिर में जाते हैं, मूर्ति के आगे माथा टेकते हैं तो
मूर्ति न कुछ बोलती है, न टोकती है, न डाँटती है। अपनी तरफ से श्रद्धा होने से थोड़ा
पुण्य होता है।
इसलिए संत कबीरजी ने यह पर्दा उठाया समाज की आँखों से,
बोले: तीरथ नहाये एक फल... तीर्थ में नहाते हो तो एक फल होता है। संत मिले फल चार-
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष लेकिन उन संत में अगर श्रद्धा-भक्ति हो और वे तुम्हारे
सद्गुरु हैं तो उनके साथ अपनत्व होगा। गुरु के साथ शिष्य का अपनत्व होता है तो गुरु
का भी शिष्य के साथ अपनत्व होता है- जैसे माँ का बच्चों के साथ अपनत्व होता है तो
माँ सार-सार बच्चे को पिला देती है।
गाय का बछड़े के साथ अपनत्व होता है तो
गाय सर्दी-गर्मी, आँधी-तूफान, धक्का-मुक्की खुद सहती है, दिनभर भटकती है लेकिन दूध
बनता है तो बछड़े को तैयार माल ऐसा मिलता है कि बस सकुर-सकुर पी ले। बछड़े को तो मुँह
हिलाना पड़ता है लेकिन सद्गुरुरूपी माँ ने जन्म-जन्म से जो कमाई की, अब भी घंटों भर
ध्यान-समाधि और रब के साथ एकाकार होते हैं... तो गाय तो खड़ी होती है और बच्चे को
सिर हिलाना पड़ता है दूध पीने के लिए लेकिन यहाँ शिष्य रूपी बछड़े खड़े नहीं होते,
प्रयत्न नहीं करते, बैठे रहते हैं और गुरु रूपी गाय ही अपने अनुभव का अमृत रब को
छुआकर कानों के द्वारा हृदय में भर देती है।
तीरथ नहाये एक फल, संत मिले फल
चार।
सद्गुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार॥
न अंतः इति अनन्तः। जिसका
अंत न हो उसे बोलते हैं अनंत। ये सारे फल अंतवाले हैं और दुःख देनेवाले हैं।
सत्शिष्य का जो फल है वह अनंत फल है, जिसका अंत मौत भी नहीं कर सकती।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।