Amar Ujala Samwad 2026
- फोटो : अमर उजाला
संवाद ही समाधान: स्वामी चिदानंद सरस्वती
स्वामी चिदानंद स्वामी से ने विशेष मंत्र 'मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ ध्वजा' के साथ संवाद की शुरुआत की। बातचीते के दौरान स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने कहा कि, सारा जीवन दैवीय आज्ञा पर होता है। प्रभु ने हमें चुन लिया है। सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी है। परमार्थ का अर्थ ही यह है कि दूसरों के लिए जीवन। बचपन से मौन की साधना की। ध्यान की साधना की। फिर हम हिमालय पर गए। आज पूरे विश्व को जिस समाधान की आवश्यकता है, चुनौतियों से निजात पाने के लिए जो उत्तर चाहिए, वो हिमालय की शांति ने दिए।
व्यस्त रहते हुए मस्त और स्वस्थ कैसे रहें, यह उसी से मिले जीवन का प्रभाव है। जीवन में संवाद का क्या प्रभाव होता है, इसके सूत्र हिमालय से मिले। आज प्रसन्नता है कि अमर उजाला ने सभी संस्थाओं के साथ मिलकर इस कार्यक्रम का नाम संवाद रखा है। संवाद ही समाधान है। संवाद से ही सभी दीवारें गिरती हैं, सारी दरारें भरती हैं, दिल से दिल जुड़ते हैं, फिर चाहे वह राष्ट्र में हों, समाज में हों, संस्थान में हों। आज संकट का एक ही कारण है- संवाद का अभाव। डायलॉग, डायलिसिस की तरह है।
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अनुशासन, आकांक्षाएं और संकल्प के बारे में...
स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने कहा कि, अनुशासन यानी निज पर शासन। सारी समस्याएं खुद से खड़ी होती हैं। अपनी सोच छोटी हो, तो समाधान ही समस्या बन जाती है। अटलजी कहते थे कि छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता। पहला अनुशासन सोच का अनुशासन है। दूसरा अनुशासन जिह्वा पर नियंत्रण का अनुशासन है। सोच ही निर्धारित करती है कि हमें क्या करना है। अमर उजाला का उदाहरण लें, तो इसके संस्थापक पहले सोच को अनुशासन में लाए। फिर तन्मय होकर इस काम में लग गए। आप अपना सौ फीसदी दीजिए। आपकी सोच ही आपके भाग्य का परिणाम है। उत्तर-दक्षिण में देखिए। जहां-जहां सोच को नियंत्रित नहीं किया, वहां-वहां हम फिसल गए। सनातन संस्कृति संवाद की संस्कृति है। गर्जना करने वाले गजनी गिरते गए, लेकिन सोमनाथ आज भी खड़ा है। जिह्वा नियंत्रण का जहां-जहां अभाव है, वहां-वहां समस्या है।
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खुशी क्या है...
साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि, जीवन में सब कुछ इकट्ठा करने के बाद रात को लोगों को नींद नहीं आती। अकेलापन बढ़ता जा रहा है। सनातन संस्कृति कहती है कि जीवन में हर समस्या का समाधान है। इस संस्कृति ने हमें जीवन दिया, जीवन जीने का ढंग दिया। अमेरिका में हमारे पास सब कुछ था। बाहर की दृष्टि से देखें, तो सब कुछ था। भीतर की शांति, भीतर की प्रसन्नता किसी के पास नहीं है। जब छोटी-सी आयु में ऋषिकेश आई, तो देखा कि गंगा के किनारे किसी से भी पूछो कि आप कैसे हैं, तो सब कहते हैं कि भगवान की कृपा है, मां गंगा की कृपा है। अमेरिका में जिनके पास सब कुछ है, वो पूछने पर शिकायतें करते रहते हैं। भारत की जमीन पर रहते हुए जिनके पास बहुत कम है, वो भी कहते हैं कि भगवान की कृपा है। अमेरिका में लोगों के लिए जीवन का प्रश्न है- मेरे लिए क्या? इस सवाल का जवाब ढूंढते-ढूंढते वे कहीं भी प्रसन्नता हासिल नहीं कर पाते।