अंकुर और शैली त्योहार पर अपने घर दिल्ली वापस जा रहे थे। अंकुर बर्न्स सर्जन था और एक बड़े अस्पताल में काम करता था। शैली भी डॉक्टर थी। उस दिन दोनों अस्पताल में बहुत व्यस्त थे। भागते-दौड़ते दोनों ने किसी तरह ट्रेन तो पकड़ ली, लेकिन कुछ खाने को नहीं ले पाए। ट्रेन में भी पैंट्री न होने के कारण खाने का कोई इंतजाम नहीं था। उनके सामने की सीट पर एक बहुत प्यारा-सा जोड़ा बैठा था। उनकी एक तीन साल की बेटी भी थी, जो बहुत प्यारी थी। वे तीनों कभी खेलते, कभी एक दूसरे को छेड़ते, कभी गाना गाते।
शैली और अंकुर चुपचाप उन्हीं लोगों को देख रहे थे। कुछ देर में अंकुर ने देखा, उस बच्ची के पिता खाना निकालने लगे। खाना देखकर अंकुर और शैली की भूख फिर से लौट आई। सामने वालों ने अंकुर और शैली को भी खाने के लिए बुलाया, पर उन्होंने मना कर दिया। बचपन से यही सीखा था कि अनजान लोगों से खाना नहीं लेना चाहिए। लेकिन वे लोग जान गए थे कि ये दोनों खाना लेना भूल गए हैं। अंततः अंकुर और शैली उन्हें मना नहीं कर पाए और खा लिया। वह सफर यादगार रहा।
अगले दिन जब अंकुर अपने परिवार के बीच त्योहार का आनंद ले रहा था, तो उसे अस्पताल से फोन आया कि एक इमरजेंसी केस है और त्योहार के कारण कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं है। ऑपरेशन दिल्ली में ही करना है। अंकुर भागते हुए अपने अस्पताल की दिल्ली शाखा में पहुंचा। जब वह ऑपरेशन थिएटर में जा रहा था, तो उसने देखा कि वही पति-पत्नी बाहर खड़े हुए हैं। पता लगा कि उनकी मां पर खाना-बनाते समय गरम तेल गिर गया और वह बुरी तरह से जल गईं। जब अंकुर ऑपरेशन के बाद बाहर निकला, तो पति-पत्नी ने उसे बार-बार धन्यवाद कहा कि जब कोई डॉक्टर आने को नहीं तैयार था, तब उन्होंने उनकी मां का ऑपरेशन किया। अंकुर बोला, जो दूसरों की मदद करता है, उसके साथ कुछ गलत कैसे हो सकता है!