समय ही सबसे बड़ी संपदा है, उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिए। शरीर की क्षमता के अनुरूप श्रम किया जाय, काम का स्तर और सिलसिला बदलते ही रहा जाय ताकि थकान नहीं चढ़ेगी। हर काम में दिलचस्पी पैदा की जाए, उसे खेल समझते हुए पूरे मनोयोग के साथ करना चाहिए।
पढ़ें,दातुन के इन फायदों को जानकर टूथब्रश करना छोड़ देंगे
यह आदत पड़ जाय तो दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी बिना थके बहुत काम करता रह सकता है। आहार-विहार विवेकपूर्ण और क्रमबद्ध होने चाहिए। समयानुसार काम बदलने से विश्राम और मनोयोग के साथ करने का अभ्यास करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम योगाभ्यास है। उस साधना में निष्णात व्यक्ति हाथों हाथ क्रिया कुशलता के अभिवर्धन और सफलताओं के वरण का उत्साहवर्द्धक लाभ प्राप्त करता है।
नाभि, देखिए और जानिए स्त्री पुरुषों की गुप्त बातें
मन को, मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त उड़ने की छूट नहीं देनी चाहिए। शरीर की तरह उसे भी क्रमबद्ध और उपयोगी चिन्तन के लिए सधाया जाना चाहिए। कुसंस्कारी मन बनैले सुअर की तरह कहीं भी किधर भी दौड़ लगाता रहता है। शरीर भले ही विश्राम करे पर मन तो कुछ सोचेगा ही। यह सोचना भी शारीरिक श्रम की तरह ही उत्पादक होता है।
समय की बर्बादी की तरह ही अनुपयोगी और निरर्थक चिन्तन भी हमारी बहुमूल्य शक्ति को नष्ट करता है। दुष्ट चिन्तन तो आग से खेलने की तरह है। आज परिस्थितियों में जो सम्भव नहीं, वैसी आकाश पाताल जैसी कल्पनाएं करते रहने, योजनाएं बनाते रहने से मनुष्य अव्यावहारिक बनता जाता है। व्यभिचार, आक्रमण, षड्यन्त्र जैसी कल्पनाएं करते रहने से मन निरंतर कलुषित होता चला जाता है और उपयोगी योजनाएं बनाने के लिए गहराई तक प्रवेश कर सकना उसके लिए संभव नहीं रहता।
हमें यह आदत डालनी चाहिए कि चिंतन का क्षेत्र निर्धारित करके उस पर मन को केन्द्रित करने की आदत यदि डाली जा सके तो मस्तिष्कीय प्रखरता का, मनोबल संपादन का द्वार खुल जाएगा और मन्दबुद्धि जैसी मस्तिष्कीय बनावट रहते हुए भी अपने चिंतन क्षेत्र में निष्णात बन जाएंगे। समय की दिनचर्या में बंधकर शरीर का श्रेष्ठतम उपयोग किया जा सकता है। मन का महत्व शरीर से कम नहीं, अधिक है। उसका भटकाव रोककर उसे उपयोगी चिंतन में सधाया जाना संभव हो सके तो मस्तिष्क की विचारशक्ति से बहुमूल्य लाभ उठाया जा सकता है।
(गायत्रीतीर्थ शान्तिकुञ्ज)