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सत्य तक जाने का मार्ग दर्शन से नहीं, काव्य से मिलता है

Fri, 15 Jun 2018 12:07 PM IST
आनंद स्वामी
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सत्य तक जाने का मार्ग दर्शन से नहीं, काव्य से मिलता है। सविता के तेजस की झलक के साथ वट-सावित्री व्रत पर एक दृष्टि। सावित्री-सत्यवान के आख्यान में व्रत वट-सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पौराणिक सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है, लेकिन सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी है। पुराणों और पांचवा वेद कहे जाने वाले महाभारत के अनुसार, सावित्री का जन्म विशेष परिस्थितियों में हुआ था। कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। संतान के लिए उन्होंने विराट यज्ञ का आयोजन किया। उस तप और यज्ञ से अभिभूत होकर सावित्री (जिन्हें सविता का तेज या शक्ति कहा जाता है) ने एक कन्या का आशीर्वाद दिया। उस कन्या का नाम सावित्री रखा गया।
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बड़ी होकर कन्या ने सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना। सत्यवान की उम्र कम बची है, यह जानकर भी वह निर्णय से पीछे नहीं हटी। साधना कर सावित्री ने यमपाश से अपने पति को छुड़ाया। वट-सावित्री व्रत की अंतर्कथा इतनी ही है। लेकिन, श्री अरविंद ने इस कथा को नया अर्थ दिया है। महाभारत की इस कथा पर आधारित सावित्री नाम का महाकाव्य लिखा। चौबीस वर्ष तक इसे लिखते और सुधारते रहे। उन्होंने कोई बारह बार इसे लिखा था, योगबल से चेतना के आकाश में वह जैसे-जैसे उठते गए, उनके लिए सावित्री का संशोधन अनिवार्य होता गया। श्री अरविंद के अनुसार, सत्य तक जाने का सही मार्ग दार्शनिक नहीं, काव्य का मार्ग है। कवि और मनीषी रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार, सावित्री मेधा का काव्य नहीं है। इस काव्य को सविता देवता के साथ एकाकार होकर ही लिखा गया है।

 
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 ‘सावित्री’ का अर्थ है सविता की पुत्री अथवा दिव्य सर्जक की शक्ति। सत्यवान अर्थात जिसके पास सत्य है या जो सत्य पाना चाहता है। कवि ने सावित्री के पिता अश्वपति को जीवन का स्वामी माना है। वेदों में अश्व जीवन शक्ति का द्योतक है। वह जिज्ञासु आत्मा के प्रतीक हैं,  जो पृथ्वी पर सतयुग लाना चाहते हैं। मानवीय चेतना कैसा महान ज्ञान अर्जित कर सकती है, वह कितनी गहराई और ऊंचाई तक जा सकती है, यह अश्वपति की तपस्या से प्रकट होता है। अश्वपति की चेतना, समष्टि चेतना के पार तक जाती है और आत्मा के दिव्यलोक में प्रवेश करती है। इस लोक में सत्य, शक्ति और चेतना एक साथ मौजूद हैं। वह इन्हें पृथ्वी पर उतारना चाहते हैं, ताकि यहां दिव्यलोक बसाया जा सके।

दैवी शक्ति से उन्हें वरदान मिलता है कि अंधकार व अज्ञान को जीतकर उसकी कृपा पृथ्वी पर उतरेगी। इस प्रकार पृथ्वी पर सावित्री का जन्म हुआ। सावित्री की कथा महाभारत की एक कथा पर आधारित है। कथा के प्रतीकों को सजीव किया गया है। अश्वपति का चरित्र विश्व-सृजन की मान्यता का प्रतीक है। सावित्री सामान्य राजकुमारी न रहकर दिव्य कृपा की अवतार बन जाती है। वह मनुष्य के दुख और अपमान को सहकर दिव्यलोक की प्राप्ति करती है। वह यमराज का सामना अपने अमृतत्व और अनंत विस्तार से ही करती है। सावित्री का जन्म, बाल्यकाल, पति के वरण की उसकी यात्रा, सत्यवान से मिलन वापस आने पर नारद से मिलन आदि कथाएं ज्यों की त्यों रखी गई हैं। अंतर इतना ही है कि श्री अरविंद की सावित्री अपनी मनुष्यता के साथ अपनी दिव्यता का भी एक साथ अनुभव करती है। 
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