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मरने के बाद यमपुरी की यात्रा ऐसे होती है, पढ़कर कलेजा कांप जाएगा

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गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि संसार का सबसे बड़ा सत्य यही है कि कोई भी व्यक्ति खुद को मरता हुआ नहीं देखता। व्यक्ति दूसरों को मरता हुआ देखता है तो उसे कुछ पल के लिए दुःख होता है उस समय वह घबराता भी है कि उसे भी एक दिन मरना होगा।
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लेकिन वह इस सत्य को अधिक समय तक स्वीकार नहीं कर पाता मनुष्य को लगता है कि दूसरे की मौत आ सकती है लेकिन वह थोड़े ही मरने वाला है। अगर मौत आएगी भी तो इसमें काफी समय है और वह जीवन के दूसरे कार्यों में मस्त हो जाता है।

लेकिन मौत कब दबे पांव आकर किसे ले जाए यह तो कोई भी नहीं जानता। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने जीवन को पानी में रखे कच्चे घड़े के समान कहा है जो पल-पल पानी में घुलता जाता है और कब पानी में पूरी तरह घुलकर नष्ट हो जाए कहा नहीं जा सकता।
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हर जीव चाहे वह पशु हो या मानव सभी को एक दिन शरीर त्यागकर परलोक जाना ही पड़ता है। परलोक का सफर बड़ा ही कष्टकारी और दुखद होता है। मरने के बाद का सफर जीवन और मृत्यु के समय के भयंकर कष्ट से भी भयंकर है। जिसके बारे में गरुड़ पुराण और कठोपनिषद् में बताया गया है।

यमपुरी की यात्रा शुरु

गरुड़ पुराण कहता है किसी व्यक्ति की मृत्यु आनी होती है तब यम के दो दूत पहले से ही व्यक्ति के आस-पास पहुंच जाते हैं। आत्मा जैसे ही शरीर से निकलती है जीवात्मा को एक नई ही दुनिया नजर आने लगती है।

यम के दूत जीवात्मा को अपने पाश में बांध लेते हैं और अपने साथ यमपुरी लेकर चलते हैं। यम के दोनों दूत बड़े ही डरावने और क्रूर हैं और जिन रास्तों से यह जीवात्मा को लेकर जाते हैं वह खतरनाक और बहुत ही दुखदायी है।

पुराण के अनुसार धरती से जब आत्मा यमपुरी के लिए चलती है तो उसे 16 गांवों का सफर तय करना होता है। जीवन में अपने कर्म के अनुसार मनुष्य को इन सभी गांवों में अलग-अलग प्रकार के कष्टों का सामना करते हुए अंत में यमपुरी पहुंचना होता है।

यमपुरी के इन गांवों के नाम हैं इन गांवों के नाम हैं सौम्यपुर, सौरिपुर, गन्धर्वपुर, शैलगाम, क्रौंचपुर, विचित्र भवन, बह्वापदपुर, दुःखपुर, नानाक्रन्दपुर, सुतप्तभवन, रौद्रपुर, पयोवर्षणपुर, शीताढयपुर और बहुभीतिपुर।

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यमपुरी के इन गांवों में आत्मा ऐसे तड़पती है

भगवान विष्णु ने गरुड़ से कहा है कि इन गांवों के मार्ग में न तो विश्राम के लिए वृक्ष की छाया है और न कहीं भोजन का प्रबंध, जिससे की जीवात्मा को राहत मिले। मार्ग में प्रलयकाल के समान कई सूर्य चमकते हैं जिससे पिण्ड से बना शरीर तपता रहता है। पीने के लिए जल की एक बूंद भी मार्ग में कहीं उपलब्ध नहीं है।

इस मार्ग में एक असिपत्र नाम का वन है इस वन में कौआ, उल्लू, गीद्घ, मधुमक्खी, मच्छर तथा कई जगह जंगल की आग है। इन सभी से पीड़ा पाते हुए प्रेतआत्मा कभी मल-मूत्र एवं रक्त के कीचड़ में गिरता है तो कभी अंधेरे कुएं में गिरकर छटपटता है। वन के पेड़ों के पत्ते तलवार जैसे हैं जससे जीवात्मा घायल होता है और अपने परिजनों को याद करके रोता है।

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इस मार्ग में आत्मा को राहत मिलता है तो वह परिजनों से प्राप्त पिण्डदान से इसलिए परिजनों को श्राद्घ और मासिक श्राद्घ करते रहना चाहिए ताकि उनके परिजनों को मार्ग में अन्न जल मिलता रहे।

अन्यथा मृत व्यक्ति की आत्मा दुःखी होकर आपने परिजनों को शाप देती है और जिससे परिवार में कई तरह की परेशानी आने लगती है।
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