बिना किसी बाहरी साधनों के दूरदराज तक देख-सुन लेना अब इतना यथार्थ लग रहा है कि सेना के जवानों के बिना हथियारों की लड़ाई के जीतने के सपने साकार करने में नासा और इसरो के सहयोगी वैज्ञानिकों, माइंड रीडर और संचार साधनों को ऑपरेट करने वाले शोधकर्ताओें और वैज्ञानिकों की एक टीम जुटी हुई है।
अंजाम देने में सेना के साथ जुटे 45 वर्षीय जैव चिकित्सा वैज्ञानिक और अल्बाने मेडिकल कॉलेज में न्यूयॉर्क स्टेट डिपार्टमेंट के स्वास्थ्य विभाग में ब्रेन कंप्यूटर के प्रमुख गेर्विन शाल्क इस दिशा में काम कर रहे हैं। योजना फिलहाल बुनियादी चरण पर है, जिसके तहत गुफाओं जैसे माहौल में संकेत भेजने और पता लगाने की तकनीक पर काम चल रहा है। पूरी उम्मीद है कि युद्ध के माहौल और शोरगुल के बीच आवाज, सिंथेटिक टेलीपैथी और तकनीक के मिश्रण के जरिए इसे मुमकिन बनाया जा सकेगा।
विज्ञान और अध्यात्म के नियमों का इस्तेमाल करते हुए लोगों के दिमाग में मौजूद चीजों को पढ़ने की कोशिश की जा रही है। वे एक खास तरह से सोचने वाले हैलमेट नुमा यंत्र बनाने में जुटे हैं कि उससे आक्रांता का दांव उसके चलने का विचार करते ही पता लग जाए। अतींद्रिय सूचना और संवाद के लिए कुछ लोग टेक्नोपैथी की बात करते हैं। उनका मानना है कि भविष्य में इस तरह की तकनीक विकसित हो सकती है, जिसमें टेलीपैथी का उपयोग कुशलता से संभव हो।
इंग्लैंड के रीडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए, जो मनुष्य के स्त्रायु तंत्र को कंप्यूटरों और एक-दूसरे से जोड़े। उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीका बन जाएगा। योग और अध्यात्म के जानकार या विद्वानों ने भी इस मिशन में मदद की पहल की है।