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मल मूत्र त्याग के समय कान पर जनेऊ क्यों लपेटते हैं?

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यज्ञोपवीत के संबंध में विख्यात है कि यह साधना और विद्या अर्जित करने के लिए गुरु के सान्निध्य में जाने का व्रतबंध है। लघु और दीर्घशंका के समय उसे दाहिने कान पर चढ़ाने तक ही इसके नियमों का पालन किया जाता है।
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कहते हैं कि इससे पाचन संस्थान ठीक रहता है और पेट तथा शरीर के निचले अंगों में विकार नहीं आता है। कुछ प्रचारक और संस्कृति सेवी विद्वान इसे 'एक्यूप्रेशर' का विकल्प भी बताते हैं।

उपयोगिता यहीं तक सीमित है तो यज्ञोपवीत की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि पाचनतंत्र से जुड़े रोगों को दूर करने के लिए कितने ही उपचार प्रचलित हैं। प्राकृतिक, होम्यौपैथिक और एलोपैथिक चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही नित नई खोजें इन लाभों को निरस्त कर देती हैं।
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इसलिए कान पर चढ़ाते हैं जनेऊ

यज्ञोपवीत का वास्तविक लाभ शुचिता को महत्व देने के रूप में हैं। मल मूत्र के त्याग के समय जनेऊ का कोई धागा कमर के नीचे तक न जाए, इसलिए कान पर चढ़ा लेते हैं ताकि वह शरीर के अधोभाग का स्पर्श न कर सके। असल कारण शुचिता को प्रतिष्पाठित करना है।

भागवत पुराण की व्याख्या में डोंगरेजी महाराज कहा करते थे कि शरीर की स्वाभाविक स्थिति पैरों के शुरु होने तक ही हैं। घुटनों से मुड़ जाने के बाद शरीर कमर तक ही सिकुड़ जाता है। जन्म से पहले भी वह इसी दशा में रहता था और ध्यान धारणा के समय भी इसी अवस्था में होता है।

ध्यान धारणा और पूजा पाठ के समय भी उसे नीचे नही उतारते। धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीकों को उनके मूल अर्थ और प्रभाव में ही समझा जाना चाहिए।

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