यज्ञोपवीत के संबंध में विख्यात है कि यह साधना और विद्या अर्जित करने के लिए गुरु के सान्निध्य में जाने का व्रतबंध है। लघु और दीर्घशंका के समय उसे दाहिने कान पर चढ़ाने तक ही इसके नियमों का पालन किया जाता है।
कहते हैं कि इससे पाचन संस्थान ठीक रहता है और पेट तथा शरीर के निचले अंगों में विकार नहीं आता है। कुछ प्रचारक और संस्कृति सेवी विद्वान इसे 'एक्यूप्रेशर' का विकल्प भी बताते हैं।
उपयोगिता यहीं तक सीमित है तो यज्ञोपवीत की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि पाचनतंत्र से जुड़े रोगों को दूर करने के लिए कितने ही उपचार प्रचलित हैं। प्राकृतिक, होम्यौपैथिक और एलोपैथिक चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही नित नई खोजें इन लाभों को निरस्त कर देती हैं।