हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण संस्कार है उपनयन इसे जनेऊ संस्कार भी कहा जाता है। इस संस्कार के बाद व्यक्ति जनेऊ धारण करने का अधिकारी बन जाता है। जनेऊ कच्चे धागों का बना होता है। इसकी लंबाई कंधे से लेकर कमर तक होती है।
जनेऊ को शास्त्रों में बड़ा ही पवित्र सूत्र बताया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस पवित्र सूत्र के रहते हुए कोई भी बुरी शक्ति अहित नहीं कर सकती है। इसलिए जनेऊ धारण करने वालों को इसकी पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।
इसकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए शौच और लघुशंका के समय लोग जनेऊ को कान पर लपेट लेते हैं। लेकिन इसमें एक
नियम यह है कि जनेऊ को हमेशा दाएं कान पर ही लपेटा जाना चाहिए।
इसलिए जरूरी है दाएं कान पर जनेऊ लपेटना
जनेऊ को दाएं कान पर लपेटने का धार्मिक कारण यह माना जाता है कि दायां कान अधिक पवित्र होता है क्योंकि इन पर प्रमुख देवताओं का वास होता है।
शास्त्रों में इस संदर्भ में कहा गया है "आदित्या वसवो रुद्रा, वायुरग्निश्च घर्रयाट। विप्रस्य दक्षिणे कर्णे, नित्यं तिष्ठन्ति देवताः।। दाएं कान पर जनेऊ रखने से यह देवताओं के संपर्क में रहता है जिससे शौच के समय भी जनेऊ की शुद्घता और पवित्रता बनी रहती है।
दाएं कान पर जनेऊ लपेटने का वैज्ञानिक कारण
वैज्ञानिक दृष्टि से जनेऊ पुरुष के स्वास्थ्य और पौरुष के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ा होता है।
मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्र की रक्षा होती है। जिन पुरुषों को स्वप्न दोष होता है उन्हें सोते समय कान पर जनेऊ लपेट कर सोना चाहिए। माना जाता है कि स्वप्न दोष की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।