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Crescent moon on Shiva forehead: आखिर क्यों भगवान शिव के मस्तक पर विराजते हैं चंद्रमा? जानें इसका रहस्य

Tue, 22 Aug 2023 05:30 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

 देवों के देव महादेव अपने भक्तों की भक्ति से बहुत जल्दी खुश हो जाते हैं। भोलेनाथ की कृपा से व्यक्ति के सभी कष्ट जल्दी दूर हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि, भगवान शिव ऐसे भगवान हैं जिन्हें आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है। 
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क्यों भगवान शिव के मस्तक पर विराजते हैं चंद्रमा? - फोटो : Amarujala
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विस्तार
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Lord Shiva: देवों के देव महादेव अपने भक्तों की भक्ति से बहुत जल्दी खुश हो जाते हैं। भोलेनाथ की कृपा से व्यक्ति के सभी कष्ट जल्दी दूर हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि, भगवान शिव ऐसे भगवान हैं जिन्हें आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है। महादेव का नाम सुनते ही सभी के मस्तिष्क में एक अलग सा ही चित्र बनने लगता है। गले में सांपों की माला हाथ में त्रिशूल और उनके लंबे केश जैसा चित्र सामने आता है। यही नहीं भगवान शिव शंकर के मस्तक पर चंद्रमा भी विराजमान है। अब कई बार आपके मन में यह सवाल आता होगा कि, आखिर भगवान शिव के मस्तक पर चंद्र देवता यानी चंद्रमा क्यों विराजमान हैं? इसका जवाब शिव पुराण में दिया गया है। चलिए इसके बारे में विस्तार से जान लेते हैं।

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भगवान शिव के मस्तक पर क्यों विराजित हैं चंद्रमा?
शिव पुराण के अनुसार माना जाता है कि, समुद्र मंथन के समय जब विष निकला तो सभी देव  व असुर परेशान हो गए। विष की मात्रा अधिक होने के कारण सभी सोचने लगे कि इसका क्या किया जाए। ऐसे में सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वो विष पी लिया। इसे पीने के बाद  भगवान शिव के कंठ में विष जमा हो गया। इस वजह से उन्हें नीलकंठ भी कहते हैं। विष के प्रभाव से भगवान शिव का शरीर अधिक गर्म होने लगा, जिसे देखकर देवी-देवता चिंता में आ गए।

सभी देवी देवता सोचने लगे कि आखिर भोलेनाथ को विष की गर्मी से किस प्रकार राहत दिलाई जाए। फिर सभी ने चंद्र देवता से प्रार्थना की कि, वह शिव जी के मस्तक पर विराजमान हो जाएं जिससे उनकी शीतलता के प्रभाव से विष की गर्मी को शांत किया जा सके। इसलिए भोलेनाथ ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है।
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अन्य कथा के अनुसार
अन्य कथा की माने तो, राजा दक्ष की 27 पुत्रियां थीं और उन्होंने सभी का विवाह चंद्रमा से किया था। इस दौरान राजा दक्ष ने यह शर्त रखी थी कि, चंद्रमा अपनी सभी 27 पत्नियों के साथ समान व्यवहार करेंगे। हालांकि, चंद्रमा रोहिणी के सबसे करीब थे। इस बात से दुखी होकर बाकी कन्याओं ने अपने पिता राजा दक्ष से शिकायत की। जिसके बाद दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दिया। जिससे वह क्षय रोग से ग्रसित हो गए। यहीं वहीं चंद्रमा की सभी कलाएं भी समाप्त हो गईं। ऐसे में नारद मुनि ने चंद्रमा से भोलेनाथ की आराधना करने के लिए कहा।

चंद्रमा ने भोलेनाथ की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया। जिसके बाद चंद्रमा के रोग दूर हो गए। वह पूर्णमासी के दिन अपने पूर्ण रूप में प्रकट हुए। इस दौरान चंद्रमा ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि, वह उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लें। बस तभी से चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं।
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