बाबाओं का बाजार इन दिनों काफी गरम है। मंत्र से मुक्ति और तंत्र से पापों को तारने वाले बाबाओं के प्रवचन और पाखंड दोनों की चर्चा चहुंओर हो रही है। आस्था के इस बाजार में जितनी तेजी से नित-नए बाबा की इंट्री हो रही है, उससे कहीं तेजी इन दिनों ढोंगी और तथाकथित बाबाओं के काले कारनामे सामने आ रहे हैं। इसके पीछे कलयुग का प्रभाव है या फिर और कोई और कारण, बता रहे हैं ज्ञान, भक्ति और कर्म जैसे गूढ़ विषयों पर कई वर्षों तक शोध कर चुके, जाने-माने ज्योतिषविद् और आध्यात्मिक चिंतक राजीव नारायण शर्मा —
भारतीय संस्कृति पुनर्जन्म एवं कर्म सिद्धातों पर आधारित है। मनुष्य के जीवन में जो भी कुछ घटित होता है और उसे इस जीवन में अच्छा या बुरा जो भी कुछ प्राप्त होता है, वह उसके प्रारब्ध कर्मों के कारण पहले से ही निश्चित होता है।
हम प्रयत्न करके किसी को नष्ट कर देंगे या उसे समाप्त कर देंगे, सर्वथा भ्रम है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति, संस्था, देश या अन्य का लाभ-हानि, यश-अपयश, सुख-दुःख सभी काल या प्रारब्ध का विषय है और वह किसी व्यक्ति विशेष के हाथ में नहीं है। शास्त्रों में कर्मों को तीन भागों में बांटा गया है।
1. संचित कर्म - पिछले विभिन्न जन्मों (84 लाख) के एकत्रित संस्कार अथवा कर्म।
2. प्रारब्ध कर्म- पिछले सभी जन्मों के पुण्य कर्म, जिनके कारण हमें मानव जीवन प्राप्त होता है।
3. आगामी कर्म- जिन्हें हमें इस जन्म में वेदानुसार-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों के द्वारा करते हुये, जीवन को सुखी और कल्याणकारी बनाना है।
क्या कहता है ज्योतिष
वैदिक ज्योतिष के अनुसार हमारी कुंडली के द्वारा ही हमारा प्रारब्ध और आगामी कर्म निर्धारित होते हैं। ज्योतिष के सच्चे मार्गदर्शन के द्वारा ही हम अपने आगामी कर्मों को शास्त्रानुसार करते हुये अपने जीवन को उन्नत, सुखी और कल्याणकारी बना सकते हैं। कल्याण, मोक्ष, आध्यात्मिक तत्व ज्ञान, भक्ति, दान-पुण्य, समाजसेवा और परमात्मा की प्राप्ति गुरु के अधीन नहीं है, यह प्रारब्ध के द्वारा पूर्व निश्चित होती है। हमारा विवेक ही हमारा गुरु है। भावमय भक्ति, ध्यान के द्वारा हमारा ये ही विवेक तत्व ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है।
कुंडली बताती है किन्हें मिलता है आध्यात्मिक ज्ञान
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, लग्न हमारा शरीर है और इसमें बैठे एवं इसे दृष्टि के द्वारा प्रभावित करने वाले ग्रहों के कारण हमारी शारीरिक सरंचना, स्वास्थ्य, चरित्र और उनका पालन करने का निर्धारण होता है। कुंडली में चंद्रमा की विभिन्न भावों में उपस्थित और उस पर अन्य ग्रहों के प्रभाव से मन, मनोदशा, भावनाओं की शुद्धता, दृष्टिकोण और मनोमय शरीर की अवस्था और स्वास्थ्य देखा जाता है। सूर्य, सम्पूर्ण शारिरिक स्वास्थ्य और आत्मा का कारक है, इसकी विभिन्न भावों में उपस्थित और इस पर अन्य ग्रहों के प्रभाव से आत्मबल, हृदय की सरलता, दया, करुणा, सदाचार का पालन और शिव भक्ति का निर्धारण होता है। बृहस्पति से सनातन धर्म, वेद, उपनिषद, योग, गीता आदि धर्म ग्रंथो का ज्ञान और उन पर श्रद्धा देखी जाती है। केतु भी आध्यात्मिक ज्ञान का और शनि को वैराग्य का कारक माना गया है। कुंडली के द्वितीय भाव से वाणी की शुद्धता और संस्कार, तीसरे भाव से आसन या ध्यान में बैठने की क्षमता, चतुर्थ भाव से संतोष, मन की शुध्दता, शान्ति और श्रद्धा, पंचम भाव से बुद्धि, विवेक और उसकी शुद्धता, शिक्षा, मंत्र जप, इष्ट देवता, ध्यान इत्यादि। नवम भाव से तीर्थ सुर तीर्थदर्शन, मंदिर, सत्कर्मों की प्रेरणा, गुरु की प्राप्ति, गुरुसेवा, ज्ञान का आत्मसात होना, यश आदि का निर्धारण होता है।
क्यों बढ़ रहा है ढोंगी बाबाओं का बाजार
अज्ञानतावश हम अपने सच्चे स्वरूप को भुलाकर और ईश्वर की महिमा पर अविश्वास करते हुये शास्त्रानुसार, जीवन को कल्याणकारी और सुखी बनाने वाले ज्ञान, कर्म और भक्ति के मार्गों को छोड़कर दंभी-पाखंडी और अल्पज्ञानी गुरुओं, संतों, महात्माओं के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। इसी के कारण सभी धर्म स्थलों से पाप, दुराचार और अन्य अधर्मी कर्मों और इन पाखंडियों के पर्दाफाश होने के समाचार निरंतर प्राप्त हो रहे हैं।
तुलसी ने चौपाई लिख जताई थी चिंता
गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में लिखा है — "पर त्रियलंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।। तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर।।" अर्थात जो परायी स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर, मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुये, वे ही मनुष्य ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले ज्ञानी हैं, मैंने कलियुग का यह चरित्र देखा है।
तुलसीदासजी आगे कहते हैं "निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोई ग्यानी सो बिरागी। जाकें नख अरु बिसाला। सोई तापस प्रसिद्ध कलि काला।।" यानि जो आचरणहीन हैं, वेद मार्ग को छोड़े हुये हैं, कलियुग में वही ज्ञानी, तपस्वी हैं, जिसके बड़े-बड़े नाखून और लंबी-लंबी जटायें हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध हैं।
गोस्वामीजी फिर कहते हैं "बहु दाम सँवारहि धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।। तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जाट कही।।" अर्थात सन्यासी बहुत धन लगाकर आश्रम (घर) सजाते हैं, उनमें वैराग्य नहीं रहा, हर प्रकार के भोग विषयों ने उन्हें हर लिया है। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती।
क्या कहता है शास्त्र
शास्त्रों के अनुसार "गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते। अज्ञान ग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः।। यानि 'गु' नाम अज्ञानता के अंधकार का है और 'रु' नाम 'ज्ञान के प्रकाश' का। अतः जो अज्ञानरूपी अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करदे वही गुरु है, इसमें कोई संशय नहीं है।
आखिर किन्हें मिलती है सिद्धि
श्रीमद्भागवत के अनुसार गुरु शरीर नहीं होता और शरीर गुरु नहीं होता। गुरु एक निराकार रूप है, जो कभी नहीं मरता। भगवान तो सभी को अपना सखा यानि मित्र बनाते हैं, चेला नहीं। भगवान से लाभ उठाने के लिये पांच प्रयास होते हैं- नामजप, ध्यान, सत्संग, सेवा और आज्ञापालन। जबकि संत-महात्माओं से लाभ उठाने के लिये तीन ही बातें हैं- सत्संग, सेवा, और आज्ञापालन। अतः गुरु की व्यक्तिपूजा और ध्यान न करके उनके सत्संग का लाभ, उनकी सेवा और आज्ञापालन करनी चाहिए। याद रखें, जिसके मन में धन की इच्छा होती है, वह धनदास होता है, और जिसके मन में चेले बनाने की इच्छा होती है वह चेलादास होता है। सिद्ध पुरुष प्रसिद्धि नहीं चाहता और प्रसिद्ध पुरुष सिद्ध नहीं हो सकता।
सिर्फ ईश्वर ही लगाएंगे पार
भगवान के साथ हमारा सदा से स्वाभाविक सम्बन्ध है, क्योंकि हम उनके सनातन अंश हैं। भगवान गीता अध्याय 15/श्लोक 7 में कहते हैं "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनः षष्ठीनीन्द्रियाणी प्रकृति स्थानिकर्षति।।" संसार में जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही अंश है, परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पांच इंद्रियों के द्वारा आकर्षण के कारण अपना मान लेता है।
भगवान अध्याय 6/श्लोक 5 में कहते हैं "उध्दरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत। आत्मैव ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।" अपने द्वारा (आत्मा) ही अपना कल्याण करें, अपना पतन न करें क्योंकि आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु।
भगवान अध्याय 10/श्लोक 10 में कहते हैं "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम। ददामि बुध्दियोगं तं येन मामुपयान्तिते।।" मेरा भजन करने वालों को मैं बुद्धियोग (विवेक) देता हूँ, जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है।
अंत में भगवान अध्याय 18/श्लोक 66 में कहते हैं "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।" हे अर्जुन! सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा (सम्पूर्ण शरणागति)। मैं तुझे सभी पापों अर्थात दुःखों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत कर।