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शंकराचार्य बनने की जंग में यह क्या कर रहे हैं धर्माधिकारी

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ज्योतिष पीठ (बद्रिकाश्रम) के शंकराचार्य पद को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई फिलहाल स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जीत तो गए हैं लेकिन लगता नहीं कि विवाद का अंत हो गया। मुकदमें में हारे दूसरे दावेदार स्वामी वासुदेवानंद इस मामले को हाईकोर्ट तक ले जाने की तैयारी में हैं। उनके अलावा एक अन्य दावेदार स्वामी माधवाश्रम की ओर से भी कानूनी लड़ाई ऊपरी अदालत तक ले जाने की तैयारी में है। उनके और स्वामी वासुदेवानंदजी के सहयोगियों का सवाल है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती क्या अब द्वारकापीठ के शंकराचार्य की दावेदारी छोड़ देंगे। याद रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 1982 से द्वारकामठ के शंकराचार्य भी हैं।
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बद्रिकाश्रम पीठ के लिए पिछले छब्बीस वर्षो से मुकदमा चल रहा था। वाराणसी की विद्वत्परिषद ने 1989 में स्वामी वासुदेवानंद का ज्योतिष पीठ (बद्रिकाश्रम) का शंकराचार्य बनाया था। दरअसल ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य का विवाद करीब 63 वर्ष पुराना है। उस समय के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ने अपनी वसीयत में चार उत्तराधिकारियों के नाम क्रम से लिखे थे। वसीयत के आधार पर स्वामी शांतानंद सरस्वती को शंकराचार्य बनाया गया। उनके शंकराचार्य बनते ही 1963 में स्वामी कृष्णबोधाश्रम ने उनके खिलाफ याचिका दायर की। मामला कोर्ट में चल ही रहा था कि सितंबर 1973 में स्वामी कृष्णबोधाश्रम ने शरीर छोड़ दिया। उनके बाद स्वामी शांतानंद सरस्वती शंकराचार्य बने।

इधर स्वामी स्वरूपानंद भी इस पद के दावेदार थे और उन्होंने 1974 में सिविल जज की अदालत में शांतानंद के खिलाफ याचिका दायर कर दी। बाद में मामले की सुनवाई इलाहाबाद में होने लगी। दोनों शंकराचार्य पद के दावेदार रहे। कुछ वर्ष बाद स्वामी स्वरूपानंद द्वारिकापीठ के शंकराचार्य भी बनाए गए।
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आदिशंकराचार्य के बनाए नियम भी जान लीजिए

धार्मिक पंरपराओं के, खासतौर पर शंकराचार्य मठों की विधिव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों की व्यवस्था और उसके पीठासीन आचार्यों के रहन सहन और आचार विचार की विधि पहले से तय है। बारह सौ साल पहले इन मठों की स्थापना से पहले ही आचार्य शंकर ने यहां के अधिकारियों की पात्रता और मर्यादा निश्चित कर दी थी।

व्यवस्था कुछ इस तरह की गई थी कि कदाचित कोई विवाद हो तो मठ के भीतर, या चारों मठों के अधिकारी अथवा उस समय सक्रिय धर्माधिकारियों के मंच पर ही मतभेदों को सुलझा लिया जाए। तिहत्तर श्लोकों की एक काव्यरचना महानुशासन के अनुसार चारों मठों के आचार्यों को अपने क्षेत्र में धर्मप्रचार के लिए निरंतर भ्रमण करते रहना चाहिए (महानुशासन 45)। उनके पास संपदा तो रहे ताकि मठ की शिक्षा और संस्कारों की गतिविधियां सुचारू रूप से चलती रहे लेकिन आचार्य को सामान्य संन्यासी की तरह ही रहना चाहिए। किसी आचार्य का दूसरे आचार्य के क्षेत्र में जाना भी मना है। (इस मर्यादा की तुलना मौजूदा आचार्यों के दूसरों के क्षेत्र में जाने और अधिकार जताने से की जानी चाहिए।)

आदि शंकर ने महानुशासन संहिता में व्यवस्था दी है कि मठों में आंतरिक विवाद तो दूर की बात हैं, आपसे में एक दूसरे के बीच भी कोई टकराव या विग्रह नहीं होना चाहिए। अगर विवाद उत्पन्न भी हो जाए तो आपस में मिल जुलकर या अन्य आचार्यों के सहयोग से हल कर लेना चाहिए। अभी की स्थिति यह है कि उत्तराधिकार संबंधी दावेदारियों के लिए भी कोर्ट कचहरियों का आश्रय लिया जा रहा है। आचार्य शंकर ने लिखा है कि पीठ के आचार्य को अपनी मेधा, बुद्धि और चरित्र से राज्य में नीति न्याय की स्थापना के लिए सक्रिय रहना चाहिए। उसका ज्ञान और शासक की सामर्थ्य मिल कर राज्य में सुशासन स्थापित करे (श्लोक 62)।
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आदिशंकराचार्य की बातों पर कितना हो रहा है अमल

कुछ स्तरों पर अब भी कोर्ट कचहरी के बाहर समाधान की कोशिशें शुरु हो गई हैं। उदाहरण के लिए अखाड़ा परिषद ने दोनों पक्ष को साथ लाने की पहल शुरू कर दी है। नासिक कुंभ के दौरान ऐसा हो जाने की उम्मीद है। कहते हैं कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती अपने प्रतिद्वंद्वी स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती से हर मुद्दे पर वार्ता के लिए सहमत हैं। लेकिन वे एक मठ की दावेदारी छोड़ने के लिए राजी होंगे या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता।

लेकिन निर्णय आने के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का पक्ष हावी हो सकता है, इसलिए स्वामी वासुदेवानंद हाईकोर्ट जाने की तैयारी में हैं। इससे छत्र, चंवर और उपाधि की लड़ाई लंबी खींच सकती है। स्वामी वासुदेवानंद वैसे भी अभी प्रयाग से बाहर हैं। उनके आने पर भेट हो सकेगी। लेकिन विवाद अब भी हल होने के आसार कम ही हैं। खास वजह राजनैतिक भी है। कांग्रेस और भाजपा दोनों की दखलंदाजी विवाद को किसी मुकाम पर पहुंचने देगी, इस मे संदेह है।

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की कांग्रेस से नजदीकियां जगजाहिर हैं। दिग्विजय सिंह से उनकी मित्रता और रामजन्मभूमि मंदिर आंदोलन, कुंभ पर्व और गोरक्षा आंदोलन के मुद्दों से सहमति और विरोध जैसे मामलों मे वे प्राय:कांग्रेस के साथ दिखाई दिए है। इधर वासुदेवानंद सरस्वती के प्रति भाजपा का समर्थन सहयोग भी बद्रिकाश्रम पीठ के विवाद के राजनैतिक पक्ष को उजागर करता है।
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