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ममता बनर्जी का गोत्र कार्ड, जानिए क्या होता है गोत्र, इस संबंध में क्या कहते हैं धर्म शास्त्र

Wed, 31 Mar 2021 02:55 PM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शादी-विवाह या किसी भी पूजन के समय अक्सर गोत्र के नाम का उच्चारण किया जाता है। गोत्र शब्द का अर्थ है वंश या कुल। जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है, उन लोगों के समूह को गोत्र कहते हैं। 
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी - फोटो : ANI
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विस्तार
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विधानसभा चुनाव के चलते बंगाल की सियासत गर्म है। मंगलवार को एक चुनाव सभा को संबोधित करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपना गोत्र कार्ड खेला। उन्होंने खुद को शांडिल्य गोत्र का बताया है। ऐसे में भाजपा ने ममता दीदी पर ये आरोप लगाया है कि वह गोत्र कार्ड खेलकर वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं। आइए धार्मिक दृष्टि से जानते हैं गोत्र क्या होता है और इसका महत्व क्या होता है। 

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शादी-विवाह या किसी भी पूजन के समय अक्सर गोत्र के नाम का उच्चारण किया जाता है। - फोटो : Pixabay
क्या होता है गोत्र
शादी-विवाह या किसी भी पूजन के समय अक्सर गोत्र के नाम का उच्चारण किया जाता है। गोत्र शब्द का अर्थ है वंश या कुल। जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है, उन लोगों के समूह को गोत्र कहते हैं। गोत्र प्रणाली का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके मूल प्राचीनतम् पहचान से जोड़ना है।

हिंदू धर्म में ऋषियों के नाम पर गोत्र बनाए गए हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
ऋषियों के नाम पर हैं गोत्र
हिंदू धर्म में ऋषियों के नाम पर गोत्र बनाए गए हैं। वैसे तो ऋषियों की संख्या लाखों—करोड़ों में मानी जाती है, लेकिन सामान्य रूप से आठ ऋषियों के नाम पर मूल आठ गोत्र माने जाते हैं। जिनके वंश के पुरुषों के नाम पर अन्य गोत्र बनाए गए। 'महाभारत' के शांतिपर्व (297/17—18) में मूल चार गोत्र बताए गए हैं।
1-अंगिरा।
2- कश्यप।
3- वशिष्ठ
4- भृगु ।
विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप — इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान 'गोत्र' कहलाती है।

हिंदू समाज में यह परंपरा है कि शादी के वक्त लड़का और लड़की का गोत्र एक दूसरे के साथ और मां के गोत्र के साथ नहीं मिलने चाहिए। - फोटो : istock
क्यों नहीं होता सगोत्र विवाह
पुराणों एवं स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगोत्र न हो, किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगोत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हिंदू समाज में यह परंपरा है कि शादी के वक्त लड़का और लड़की का गोत्र एक दूसरे के साथ और मां के गोत्र के साथ नहीं मिलने चाहिए। साथ ही लड़के—लड़की का गोत्र नानी और दादी के गोत्र से भी नहीं मिलाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि शादी के लिए तीन पीढ़ियों का गोत्र अलग होना आवश्यक है। जब ऐसा हो तभी शादी की अनुमति देनी चाहिए। विवाह निश्चित करते समय गोत्र के साथ प्रवर का भी ख्याल रखना जरूरी है। प्रवर भी प्राचीन ऋषियों के नाम है, पर अंतर यह है कि गोत्र का संबंध रक्त से है, जबकि प्रवर से आध्यात्मिक संबंध है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक ही गोत्र में विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकती है। - फोटो : istock
क्या कहते हैं धर्मग्रंथ
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक ही गोत्र में विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकती है। माना जाता है कि एक ही गोत्र का होने के कारण लड़का और लड़की भाई—बहन हो जाते हैं। यही कारण है कि तीन गोत्र छोड़कर शादी करने की मान्यता है। पहला गोत्र खुद का, दूसरा गोत्र मां का और फिर दादी का और फिर नानी का।
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एक ही गोत्र होने से गुणसूत्र एक जैसे हो जाते हैं। समान गुणसूत्र होने से संतान में कई तरह की समस्या पैदा हो सकती है। - फोटो : iStock
सगोत्र विवाह न करने का वैज्ञानिक तर्क
एक ही गोत्र में शादी न करेने का वैज्ञानिक कारण भी माना जाता है। एक ही गोत्र होने से गुणसूत्र एक जैसे हो जाते हैं। समान गुणसूत्र होने से संतान में कई तरह की समस्या पैदा हो सकती है। इस तरह के विवाह से पैदा होने वाली संतानों में कई तरह के रोग और कई तरह के अवगुण पाए जाते हैं। इसलिए एक ही गोत्र में शादी करने से बचना चाहिए।
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