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Vat Savitri Vrat 2021: इस दिन अखंड सौभाग्य के लिए व्रत करती हैं सुहागिन स्त्रियां, जानिए महत्व, तिथि, पूजा विधि और व्रत कथा

Fri, 04 Jun 2021 07:08 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

  • 10 जून 2021 दिन गुरुवार को रखा जाएगा वट सावित्री व्रत
  • सुहागिन स्त्रियां अखंड सौभाग्य और संतान प्राप्ति  लिए रखती है वट सावित्री व्रत
  • वट सावित्री व्रत की पूजा विधि, कथा समेेत पूूरी जानकारी
 
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वट सावित्री व्रत 2021 - फोटो : self
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विस्तार
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प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन वट सावित्री का व्रत किया जाता है। इस बार यह व्रत 10 जून 2021 दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत सुहागिन स्त्रियों के लिए बेहद खास और महत्वपूर्ण होता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए व्रत करती हैं। यह व्रत देवी सावित्री को समर्पित किया जाता है, सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से बचाए थे, इसलिए मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वट सावित्री व्रत में स्त्रियां पूरे दिन उपवास करती हैं और वट वृक्ष एवं सावित्री सत्यवान की पूजा करती हैं एवं कथा पढ़ती हैं। आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत महत्व, पूजा विधि, सामग्री लिस्ट और वट सावित्री की कथा।

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वट सावित्री व्रत 2021
वट सावित्री शुभ मुहूर्त-
ज्येष्ठ अमावस्या तिथि प्रारंभ- 09 जून 2021 दिन बुधवार को दोपहर 01 बजकर 57 मिनट से
ज्येष्ठ अमावस्या तिथि समाप्त- 10 जून 2021 दिन गुरुवार को शाम 04 बजकर 20 मिनट पर
व्रत पारण- 11 जून 2021 दिन शुक्रवार

वट के वृक्ष की पूजा करने और सूत बांधने का महत्व
इस दिन वट वृक्ष में सूत बांधने और पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और डालियों व पत्तों में भगवान शिव का वास होता है। इसके आलावा धार्मिक मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी इस कारण ही अपने पति की दीर्घायु की कामना के साथ रक्षा सूत्र के रूप में वट वृक्ष में सूत बांधा जाता है और पूजा की जाती है। स्त्रियां देवी सावित्री से अखंड सौभाग्य और संतान प्राप्ति की कामना करती हैं।

वट सावित्री व्रत 2021 - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
पूजा सामाग्री-
सावित्री-सत्यवान की प्रतिमाएं, बांस का पंखा, लाल कलावा (मौली) या सूत, धूप-दीप, घी-बाती, पुष्प, फल, कुमकुम या रोली, सुहाग का सामान, पूरियां, गुलगुले, चना, बरगद का फल, कलश जल भरा हुआ।

वट सावित्री पूजा विधि-
  • इस पावन दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नानादिन करने के पश्चात स्वच्छ शुभ रंग के वस्त्र धारण करें।
  • अब घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर दें और व्रत का संकल्प करें।
  • वट सावित्री में वट वृक्ष (बरगद) की पूजा करने का विधान है।
  • किसी वट वृक्ष के नीचे जाएं और वहां पर सावित्री-सत्यवान की प्रतिमाएं रखकर प्रणाम करें।
  • अब वट वृक्ष में जल दें और प्रतिमाओं को भी जल अर्पित करें।
  • अब सभी पूजन सामाग्री और सुहाग का सामान अर्पित करें।
  • अब सूत को दाएं हाथ से वट वृक्ष में लपेटते हुए सात बार परिक्रमा करें और परिक्रमा पूर्ण होने पर प्रणाम करें।
  • इसके बाद वट वृक्ष के नीचे बैठकर सावित्री-सत्यवान की कथा पढ़े या श्रवण करें।

वट सावित्री की कथा-
मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा का राज था। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने यज्ञ करवाया। जिसके शुभ फल से कुछ समय बाद उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई, इस कन्या का नाम सावित्री रखा गया। जब सावित्री विवाह योग्य हुई तो उन्होंने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पतिरूप में वरण किया। सत्यवान के पिता भी राजा थे परंतु उनका राज-पाट छिन गया था, जिसके कारण वे लोग बहुत ही द्ररिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे थे। सत्यवान के माता-पिता की भी आंखों की रोशनी चली गई थी। सत्यवान जंगल से लकड़ी काटकर लाते और उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना गुजारा करते थे।
 
जब सावित्री और सत्यवान के विवाह की बात चली तब नारद मुनि ने सावित्री के पिता राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष पश्चात ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। जिसके बाद सावित्री के पिता नें उन्हें समझाने के बहुत प्रयास किए परंतु सावित्री यह सब जानने के बाद भी अपने निर्णय पर अडिग रही। अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। इसके बाद सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा में लग गई।

समय बीतता गया और वह दिन भी आ गया जो नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु के लिए बताया था। उसी दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन को गई। वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ने लगा कि उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी, कुछ वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ ही समय में उनके समक्ष अनेक दूतों के साथ स्वयं यमराज खड़े हुए थे। यमराज सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी। 
 
आगे जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, 'हे पतिव्रता नारी! जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है, तुमने अपने पति का साथ दे दिया। अब तुम लौट जाओ' इस पर सावित्री ने कहा, 'जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए। यही सनातन सत्य है' यमराज सावित्री की वाणी सुनकर प्रसन्न हुए और उनसे तीन वर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, 'मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें' यमराज ने 'तथास्तु' कहकर उसे लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे किंतु सावित्री यम के पीछे ही चलती रही । यमराज ने प्रसन्न होकर पुन: वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर मांगा, 'मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए।
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इस तरह सावित्री ने बचाए अपने पति के प्राण
इसके बाद सावित्री ने यमदेव से वर मांगा, 'मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें' सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो सावित्री से तथास्तु कहा। जिसके बाद सावित्री न कहा कि मेरे पति के प्राण तो आप लेकर जा रहे हैं तो आपके पुत्र प्राप्ति का वरदान कैसे पूर्ण होगा। तब यमदेव ने अंतिम वरदान को देते हुए सत्यवान की जीवात्मा को पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री पुनः उसी वट वृक्ष के लौटी तो उन्होंने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हो रहा है। कुछ देर में सत्यवान उठकर बैठ गया। उधर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया।
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