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Vasant Panchami 2018: नई चेतना और स्फूर्ति को उभारने का पर्व है वसंत पंचमी

Sat, 20 Jan 2018 02:45 PM IST
डॉ. प्रणव पंड्या
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वसंत पर्व एक दिव्य उर्वर ऊर्जा लेकर आता है। उसका दिव्य प्रवाह स्थूल और सूक्ष्म, दोनों प्रकार की दिव्य धाराएं लिए होता है। स्थूल प्रवाह का प्रभाव वृक्षों में नई कोपलों, पलाश के फूलों, गेहूं, सरसों की लहलहाती फसलों के रूप में सभी जगह दिखाई देता है। सूक्ष्म प्रवाह, श्रेष्ठ संवेदनाओं से ज्ञान और विवेक को पोषण देता है।

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पौराणिक कथानुसार, सृष्टि की रचना के समय विष्‍णु जी ने ब्रह्मा जी से आग्रह किया कि वह सृष्टि को नया रूप प्रदान करें। उनके आग्रह पर ब्रह्मा जी ने आरंभ में मनुष्यों की रचना की। ब्रह्मा जी ने महसूस किया कि जीवों की सर्जन के बाद भी चारों ओर मौन छाया रहता है। उन्होंने विष्‍णु जी से अनुमति लेकर अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे पृथ्वी पर एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। छह भुजाओं वाली इस शक्ति का रूप एक सुंदर स्त्री का था, जिसके एक हाथ में पुस्तक, दूसरे में पुष्प, तीसरे और चौथे में हाथ में कमंडल और बाकी के दो हाथों में वीणा और माला थी। 

ब्रह्मा जी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, चारों ओर ज्ञान और उत्सव का वातावरण फैल गया, वेदमंत्र गूंज उठे। ऋषियों की अंतःचेतना उन स्वरों को सुनकर झूम उठी। ज्ञान की जो लहरियां व्याप्त हुईं, उन्हें ऋषिचेतना ने संचित कर लिया। वेदों के रूप में वह ज्ञान संचित हुआ, जो आज भी मनुष्य को उत्कर्ष कर रहा है। शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है। प्राचीन ग्रंथों व काव्य ग्रंथों में अलग-अलग ढंग से वसंत का चित्रण मिलता है। 

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प्राचीन मान्यतानुसार, असल वसंत पंचमी तो होली के दिन मनाई जाती है। उक्त मान्यता व  समय के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन तो हेमंत ऋतु होती है। उत्सव धर्मी और आध्यात्मिक कारणों से अन्य ऋतुओं ने अपनी अवधि या आयु के आठ-आठ दिन वेदमाता के अवतरण उत्सव को दिए हैं और इस तरह वंसत पंचमी, वसंत उत्सव से चालीस दिन पहले मनाई जाने लगी है।

कवि और विद्वान लोगों ने काव्य रचनाओं में वंसत का उदाहरण युवापन के प्रतीक के रूप दिया है। उल्लास-उमंग, हर्ष-विनोद, आमोद-प्रमोद की बातें प्राय: वसंत से जोड़कर देखी जाती हैं। इस दृष्टि से वसंत पंचमी युवाओं का पसंदीदा त्योहार है। प्राचीन भारत में पूरे साल को छह ऋतुओं में बांटा गया था, उनमें वसंत सबका मनचाहा मौसम था, आज भी है। 

इस दिन बिना मुहूर्त जाने, शुभ और मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती और सद्ग्रंथों का पूजन किया जाता है। भगवान विष्णु और कामदेव की भी पूजा भी की जाती है। संगीतकार अपने वाद्य-यंत्रों का पूजन करते हैं। विद्यालयों और गुरुकुलों में सरस्वती और वेदों का पूजन किया जाता है। 

वसंत सृजन का प्रतीक है, उत्साह-उल्लास का प्रतीक है। वसंत प्राणियों के अंदर नए प्राण का संचार करता है। वसंत पर्व प्राणवान बनने, अपने आप में नई चेतना और नई स्फूर्ति को उभारने का पर्व है। इस पर्व पर इसी तरह के सृजन प्रयास होने चाहिए।

अमर उजाला के कल्पवृक्ष पन्ने से साभार
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