प्राचीन मान्यतानुसार, असल वसंत पंचमी तो होली के दिन मनाई जाती है। उक्त मान्यता व समय के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन तो हेमंत ऋतु होती है। उत्सव धर्मी और आध्यात्मिक कारणों से अन्य ऋतुओं ने अपनी अवधि या आयु के आठ-आठ दिन वेदमाता के अवतरण उत्सव को दिए हैं और इस तरह वंसत पंचमी, वसंत उत्सव से चालीस दिन पहले मनाई जाने लगी है।
कवि और विद्वान लोगों ने काव्य रचनाओं में वंसत का उदाहरण युवापन के प्रतीक के रूप दिया है। उल्लास-उमंग, हर्ष-विनोद, आमोद-प्रमोद की बातें प्राय: वसंत से जोड़कर देखी जाती हैं। इस दृष्टि से वसंत पंचमी युवाओं का पसंदीदा त्योहार है। प्राचीन भारत में पूरे साल को छह ऋतुओं में बांटा गया था, उनमें वसंत सबका मनचाहा मौसम था, आज भी है।
इस दिन बिना मुहूर्त जाने, शुभ और मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती और सद्ग्रंथों का पूजन किया जाता है। भगवान विष्णु और कामदेव की भी पूजा भी की जाती है। संगीतकार अपने वाद्य-यंत्रों का पूजन करते हैं। विद्यालयों और गुरुकुलों में सरस्वती और वेदों का पूजन किया जाता है।
वसंत सृजन का प्रतीक है, उत्साह-उल्लास का प्रतीक है। वसंत प्राणियों के अंदर नए प्राण का संचार करता है। वसंत पर्व प्राणवान बनने, अपने आप में नई चेतना और नई स्फूर्ति को उभारने का पर्व है। इस पर्व पर इसी तरह के सृजन प्रयास होने चाहिए।
अमर उजाला के कल्पवृक्ष पन्ने से साभार