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क्यों खास है ‘ओम’ मंत्र? जानिए इससे जुड़े 5 महत्वपूर्ण तथ्य

Mon, 22 Jun 2026 09:14 AM IST
Shweta Singh ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

हिंदू धर्म में ‘ओम’ को एक पवित्र ध्वनि माना गया है जो मन को शांति और आत्मा को ऊर्जा प्रदान करती है। जानिए इसका आध्यात्मिक महत्व, ब्रह्मांड से संबंध और उपनिषदों में वर्णित रहस्य।

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ॐ मंत्र - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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हिंदू धर्म में ‘ओम’ केवल एक साधारण शब्द नहीं, बल्कि एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी ध्वनि मानी जाती है, जो सृष्टि की शुरुआत और ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा से जुड़ी हुई है। प्राचीन काल के तपस्वियों और ध्यानियों ने जब गहन ध्यान की अवस्था प्राप्त की, तो उन्होंने भीतर और बाहर एक निरंतर गूंजती हुई सूक्ष्म ध्वनि का अनुभव किया। यह ध्वनि किसी बाहरी स्रोत से नहीं, बल्कि अस्तित्व के हर कण में विद्यमान एक कंपन की तरह महसूस हुई। जब साधना और ध्यान की गहराई बढ़ी, तो यह अनुभव और भी स्पष्ट होता गया, मानो चारों ओर एक ही दिव्य स्वर लगातार प्रवाहित हो रहा हो, जो मन को स्थिर और आत्मा को शांत कर देता है। इसी अनुभव को समझने और अभिव्यक्त करने के लिए ऋषि-मुनियों ने इसे ‘ओम’ नाम दिया, जो आज भी ध्यान, साधना और आध्यात्मिक जागरण का सबसे पवित्र प्रतीक माना जाता है।

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ॐ मंत्र - फोटो : adobe stock
ऊं शब्द का आध्यात्मिक महत्व
‘ऊं’ शब्द हिंदू धर्म में केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक माना गया है। यह ‘ओ’, ‘उ’ और ‘म’ तीन ध्वनियों से मिलकर बना है, जो जीवन ऊर्जा, संतुलन और परम चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। इसे ध्यान और साधना का मूल मंत्र माना जाता है, जो मन को स्थिर कर आंतरिक शांति प्रदान करता है।

ऊं’ का जप शरीर के ऊर्जा चक्रों-नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र पर गहरा प्रभाव डालता है। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

ऊर्जा केंद्रों से संबंध
मान्यता है कि ‘ऊं’ का जप शरीर के ऊर्जा चक्रों-नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र पर गहरा प्रभाव डालता है। इससे साधक की एकाग्रता बढ़ती है और मानसिक तनाव कम होता है। यह शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक माना गया है।

 

ॐ मंत्र - फोटो : amar ujala

त्रिदेवों का प्रतीक
धार्मिक दृष्टि से ‘ऊं’ को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी माना जाता है। यह सृष्टि के निर्माण, पालन और विनाश के चक्र को दर्शाता है, जो ब्रह्मांड के सतत चलने वाले क्रम को समझाता है।

उपनिषदों में ‘ओंकार’ को ब्रह्मांड का मूल स्वरूप बताया गया है। - फोटो : amar ujala

उपनिषदों में उल्लेख
उपनिषदों में ‘ओंकार’ को ब्रह्मांड का मूल स्वरूप बताया गया है। यह भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों को समाहित करने वाली दिव्य ध्वनि मानी जाती है, जो संपूर्ण अस्तित्व का आधार है।

ॐ मंत्र - फोटो : adobe stock

मोक्ष और आध्यात्मिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ‘ऊं’ का नियमित जप व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यह मन को शांत करता है और साधक को उच्च आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है।

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ॐ मंत्र - फोटो : adobe stock

सृष्टि की उत्पत्ति से संबंध
4शिव पुराण में ‘ओंकार’ को सृष्टि की उत्पत्ति से जोड़ा गया है। इसमें बताया गया है कि नाद (ध्वनि) और बिंदु (प्रकाश) के मिलन से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ, और उसी दिव्य ध्वनि का स्वरूप ‘ऊं’ माना जाता है, जो आज भी ब्रह्मांड में निरंतर प्रवाहित है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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