ऊं शब्द का आध्यात्मिक महत्व
‘ऊं’ शब्द हिंदू धर्म में केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक माना गया है। यह ‘ओ’, ‘उ’ और ‘म’ तीन ध्वनियों से मिलकर बना है, जो जीवन ऊर्जा, संतुलन और परम चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। इसे ध्यान और साधना का मूल मंत्र माना जाता है, जो मन को स्थिर कर आंतरिक शांति प्रदान करता है।
ऊं’ का जप शरीर के ऊर्जा चक्रों-नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र पर गहरा प्रभाव डालता है।
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ऊर्जा केंद्रों से संबंध
मान्यता है कि ‘ऊं’ का जप शरीर के ऊर्जा चक्रों-नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र पर गहरा प्रभाव डालता है। इससे साधक की एकाग्रता बढ़ती है और मानसिक तनाव कम होता है। यह शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक माना गया है।
त्रिदेवों का प्रतीक
धार्मिक दृष्टि से ‘ऊं’ को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी माना जाता है। यह सृष्टि के निर्माण, पालन और विनाश के चक्र को दर्शाता है, जो ब्रह्मांड के सतत चलने वाले क्रम को समझाता है।
उपनिषदों में ‘ओंकार’ को ब्रह्मांड का मूल स्वरूप बताया गया है।
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उपनिषदों में उल्लेख
उपनिषदों में ‘ओंकार’ को ब्रह्मांड का मूल स्वरूप बताया गया है। यह भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों को समाहित करने वाली दिव्य ध्वनि मानी जाती है, जो संपूर्ण अस्तित्व का आधार है।
मोक्ष और आध्यात्मिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ‘ऊं’ का नियमित जप व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यह मन को शांत करता है और साधक को उच्च आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है।
सृष्टि की उत्पत्ति से संबंध
4शिव पुराण में ‘ओंकार’ को सृष्टि की उत्पत्ति से जोड़ा गया है। इसमें बताया गया है कि नाद (ध्वनि) और बिंदु (प्रकाश) के मिलन से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ, और उसी दिव्य ध्वनि का स्वरूप ‘ऊं’ माना जाता है, जो आज भी ब्रह्मांड में निरंतर प्रवाहित है।
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