अध्ययन, अध्यापन के साथ-साथ उन्होंने लेखन कार्य भी आरंभ किया। इसी क्रम में उनकी दो कृतियाँ प्रकाशित हुईं- दि फिलॉसफी ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा दि रीजन ऑफ रिलीजन इन कोरेम्पथेरी फिलॉसफी। इन पुस्तकों के प्रकाशन ने उनकी प्रतिभा का परिचय दिया। पूर्वी तथा पाश्चात्य दर्शन दोनों में उनकी गहरी पैठ और गहन अध्ययन का निचोड़ इन पुस्तकों में अद्भुत हुआ। विदेशों में भी उनकी कृतियाँ काफी पसंद की गयीं।
उनकी प्रकाशित इण्डियन फिलासफी तथा द हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ ने तो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर का व्यक्ति बना दिया था। ऑक्सफोर्ड के मैनचेस्टर कॉलेज में उनको ‘जीवन का हिन्दू दृष्टिकोण’ विषय पर व्याख्यान देने के लिए विशेष आग्रहपूर्वक निमंत्रित किया था। केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में उनके व्याख्यान सुनकर बुद्धिजीवियों ने एक मत से स्वीकार किया था कि प्रो० राधाकृष्णन का ज्ञान अत्यंत गंभीर और विस्तृत है। भारतीय और पश्चिमी दोनों दर्शनों के वे महापण्डित हैं। राधाकृष्णन हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध विद्वान् हैं। अमेरिका तथा ब्रिटेन के विभिन्न विश्वविद्यालयों में विभिन्न विषयों पर व्याख्यान देने के साथ डॉ. राधाकृष्णन चर्च और गिरजाधरों में भी बुलाये जाते थे। ये वहाँ धर्म तथा अध्यात्म के गहन आधारभूत तथ्यों पर विस्तृत जानकारी देते। जर्मनी के कई विश्वविद्यालयों में भी उनकी व्याख्यानमालाएँ चलीं और विदेशों में भारत का एक नया स्वरूप उजागर हुआ। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों के उच्च पदों पर आसीन रहे। वे आन्ध्र विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। इसके अलावा वे इण्टर नेशलन इण्टेलेक्चुअल कोऑपरेशन कमेटी (अन्तर्राष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग समिति) के सदस्य बने। यह समिति राष्ट्र संघ ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बौद्धिक सहयोग की स्थापना के लिए गठित की थी।
डॉ. राधाकृष्णन का एक मात्र उद्देश्य था संतप्त मानवता को शान्ति की शालीनता प्रदान करना। वे रूस में भारत के राजदूत रहे थे। इससे पूर्व वे बनारस विश्वविद्यालय के मानद कुलपति तथा भारतीय विश्व विद्यालय आयोग के अध्यक्ष पदों को सुशोभित कर चुके थे। जिस समय डॉ. राधाकृष्णन रूस से विदा होने लगे तो स्टालिन से उनकी अंतिम मुलाकात का जिक्र करते हुए प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि स्टालिन की आँखें सूजी हुई और लाल थी। डॉ. राधाकृष्णन ने स्टालिन के गालों पर हाथ फेरा और उनकी पीठ को थपथपाया। स्टालिन ने कहा- आप पहले व्यक्ति हैं,जो मुझसे मानव सा व्यवहार करते हैं, शेष सब राजदूत तो मुझे दैत्य मानकर दूर रहते हैं। आप हम सबको छोड़कर जा रहे हैं, इसका मुझे भारी दुःख है। यह कहते स्टालिन की आँखें सजल हो उठी थीं।
लेखक- देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख हैं।