हिंदू धर्म में सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है और सूर्यदेवता से जुड़े हुए कई व्रत-त्योहार मनाए जाने की परंपरा है। इन्ही त्योहारों में मकर संक्रांति भी एक प्रमुख त्योहार है। जिसमें सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में आते हैं तब मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। मकर संक्रांति के त्योहार को उत्तरायण भी कहा जाता है जहां से सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण दिशा में चलना आरंभ कर देते हैं। हिंदू धर्म में उत्तरायण पर्व का विशेष महत्व होता है। सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर पवित्र नदियों में स्नान, ध्यान और दान किया जाता है। मान्यता है इस दिन किया गया दान और गंगा स्नान से कई गुने फल की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के मौके पर आइए जानते हैं सूर्य के उत्तरायण का महत्व...
सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन
हिंदू पंचांग के अनुसार एक वर्ष को दो भागों में बांटा जाता है जिसे अयन कहते हैं। यानी एक वर्ष में दो अयन होते हैं। एक वर्ष में दो बार सूर्य अपनी स्थिति में परिवर्तन करते हैं। सूर्य के सालभर में दो बदलावों को उत्तरायण और दक्षिणायन कहा जाता है। सूर्यदेव 6 महीने के लिए उत्तरायण रहते हैं और बाकी के 6 महीनों में दक्षिणायन। हिंदू पंचांग की काल गणना के आधार पर जब सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि की यात्रा करते हैं तब इस अंतराल को उत्तरायण कहा जाता है। इसके बाद जब सूर्य कर्क राशि धनु राशि की यात्रा पर निकलते हैं तब इस समय को दक्षिणायन कहते हैं। इस तरह से सूर्य एक वर्ष में 6-6 महीने के लिए उत्तरायण और दक्षिणायन रहते हैं।
शास्त्रों में उत्तरायण का महत्व
- मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। कहा जाता है कि सूर्य के इस बदलाव से व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इसके अलावा इस दिन से रात छोटी और दिन बड़ा होने लगता है। यहां रात के छोटे होने से अंधकार कम होने और दिन के बड़े होने से प्रकाश में वृद्धि होने की बात कही गई है। यही वजह है कि सूर्य के इस परिवर्तन यानी कि मकर संक्रांति के दिन को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना भी कहते हैं।
- उत्तरायण के काल को देवताओं का दिन कहा जाता है। मकर संक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण होने पर खरमास खत्म हो जाता है और शुभ कार्य दोबारा से आरंभ हो जाते हैं ,इसीलिए इस दौरान नए कार्य, गृह प्रवेश , यज्ञ, व्रत - अनुष्ठान, विवाह, मुंडन जैसे कार्य करना शुभ माना जाता है।
- उत्तरायण के काल को देवताओं का दिन कहा जाता है। इसलिए सूर्य के उत्तरायण होने पर सभी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य किए जाते हैं। मान्यता है कि उत्तरायण में शुभ कार्य करने पर उसमें सफलता जरूर मिलती है।
- गीता में बताया गया है कि उत्तरायण काल में शरीर का त्याग करने पर मोक्ष की प्राप्ति ही होती है जबकि दक्षिणायन में शरीर का त्याग करने पर दोबारा से जन्म लेना पड़ता है।
- सूर्य के उत्तरायण के इसी महत्व के कारण ही भीष्म पितामह ने अपना प्राण तब तक नहीं त्यागे, जब तक मकर संक्रांति अर्थात सूर्य की उत्तरायण स्थिति नहीं आ गई।
- सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन का वैज्ञानिक महत्व भी है। माना जाता है जब सूर्य पूर्व से दक्षिण दिशा की ओर चलता है तो उसके किरणें सेहत के नजरिए से खराब होती है लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की दिशा में चलता है तब वही किरणें सेहत के लिए अच्छी मानी जाती है।
उत्तरायण में दान और स्नान का महत्व
उत्तरायण काल को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि माना गया है। सूर्य के उत्तरायण होने पर पवित्र नदियों में स्नान और दान करने का महत्व काफी बढ़ जाता है। उत्तरायण पर गंगा स्नान के बाद सूर्यदेव अर्घ्य अर्पित करना और सूर्यदेव से जुड़े मंत्रों का करना काफी शुभफलदायक होता है।
उत्तरायण | Uttarayan
- उत्तरायण मास को देवी- देवताओं का दिन माना गया है।
- उत्तरायण के 6 महीनों के दौरान नए कार्य जैसे- गृह प्रवेश , यज्ञ, व्रत, अनुष्ठान, विवाह, मुंडन आदि जैसे कार्य करना शुभ माना जाता है।
- उत्तरायण के समय दिन लंबा और रात छोटी होती है।
- उत्तरायण में तीर्थयात्रा, धामों के दर्शन और उत्सवों का समय होता है।
- उत्तराणण के दौरान तीन ऋतुएं होती है- शिशिर, बसन्त और ग्रीष्म
दक्षिणायन | Dakshinayan
- मान्यताओं के अनुसार दक्षिणायन का काल देवताओं की रात्रि मानी गई है।
- दक्षिणायन के समय में रातें लंबी हो जाती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं।
- अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 21/22 जून से दक्षिणायन आरंभ होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दक्षिणायन होने पर सूर्य दक्षिण की ओर झुकाव के साथ गति करता है।
- दक्षिणायन में विवाह, मुंडन, उपनयन आदि विशेष शुभ कार्य निषेध माने जाते हैं।
- दक्षिणायन के दौरान वर्षा, शरद और हेमंत, ये तीन ऋतुएं होती हैं।