दैत्य अक्सर देवताओं पर आक्रमण करते थे। एक बार भयानक युद्ध हुआ और वर्षों तक चला। उस युद्ध में सृष्टि का अस्तित्व संकट में पड़ गया। पराजित होकर देवगण वन-वन भटकने लगे। उनकी व्यथा लेकर देवर्षि नारद कश्यप मुनि के आश्रम में पहुंचे और संकट के बारे में बताया।
नारद ने सलाह दी कि इस संकट से सूर्य के समान तेजस्वी और बलशाली सत्ता ही मुक्ति दिला सकती है। वह यदि देवों का प्रतिनिधित्व करे, तो बात बने। लेकिन सूर्य प्रकट रूप में एक महाविराट अग्निपिंड है, उसे मनुष्य के रूप में जन्म लेकर देवशक्तियों का सेनापतित्व करना चाहिए।
ऐसी तेजस्वी संतान कोई तेजस्वी स्त्री ही जन्म दे सकती है। बहुत सोच-विचार और खोज-पड़ताल के बाद उन्होंने कहा कि इसके लिए महर्षि कश्यप की पत्नी और देवमाता अदिति ही सूर्य की मां बन सकती हैं।