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क्या निःसंतान लोगों को नर्क में जाना पड़ता है?

Wed, 25 Sep 2013 07:46 AM IST
टीम डिजिटल
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शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र के हाथों से पिण्डदान और श्राद्घ होने पर पितरों को मुक्ति मिलती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि पुत्र ही श्राद्घ कर सकता है। पुत्री द्वारा किया गया श्राद्घ और पिण्डदान भी पितरों को प्राप्त होता है। इसलिए विवाह के बाद हर व्यक्ति संतान सुख की कामना करता है।
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लेकिन जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति की यह कामना पूरी हो। कुछ लोग इस सुख से वंचित भी रह जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि संतानहीन व्यक्ति को मुक्ति नहीं मिल सकती है। निःसंतान व्यक्ति के श्राद्घ के विषय में वशिष्ठ स्मृति में कहा गया है कि पत्नी चाहे तो पति का श्राद्घ कर सकती है।

सगे भाइयों को भी श्राद्घ का अधिकार प्राप्त है। इनके द्वारा किया गया श्राद्घ मृतक को प्राप्त हो जाता है। अगर सगे भाइयों में से किसी के पुत्र संतान है तो यह श्राद्घ कर सकता है। इनके द्वारा किया गया श्राद्घ अपने पुत्र द्वारा किए श्राद्घ के समान फलदायी होता है। इनके अलावा दामाद और नाती को भी श्राद्घ का अधिकार प्राप्त है।
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श्राद्घ के सामान्य नियम
तर्पण करते समय अंगूठे से ही पिंड पर जलांजलि समर्पित करें। ऐसी मान्यता है कि अंगूठे से दी गई जलांजलि पितरों तक पहुंचती है। तर्पण करते वक्त अंगूठे से ही पिंड पर जलांजलि दी जाती है। कहा गया है कि अंगूठे के जरिए दी गई जलांजलि सीधे पितरों तक पहुंचती है। बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिंडदान नहीं किया जाता। अर्थात् श्राद्ध उन्हीं का होता है, जिनको मैं और मेरे की आसक्ति होती है।

श्राद्ध संपन्न होने पर कौवे, गाय, कुत्ते, चींटी तथा भिखारी को भी यथा नियम भोजन वितरित करना चाहिए। पितृ पक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर, परिवार व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।
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