वे पिछले आठ से भी ज्यादा दशक से सिद्धगंगा मठ के प्रमुख थे, जो बेंगलुरू से 70 किलोमीटर दूर टुमकूर में लिंगायत समुदाय की सबसे शक्तिशाली धार्मिक संस्थाओं में गिना जाता है।कर्नाटक के पूर्व अतिरिक्त चीफ सेक्रेटरी डॉक्टर एसएम जामदार ने कहा, "लिंगायत स्वामियों में, या कहें कि भारत के आध्यात्मिक गुरूओं में, उनकी शख़्सियत दुर्लभों में भी दुर्लभतम थी। वे कई स्वामियों के आदर्श थे।"
बाक़ी धार्मिक गुरूओं से अलग
धार्मिक विषयों के जानकार, वचन स्टडीज के पूर्व निदेशक रमजान दर्गा कहते है, "88 सालों से उन्होंने हर जाति और हर समुदाय के अनाथों और बच्चों की सेवा की। कोई भी उनके आवासीय स्कूलों में जा सकता था, पढ़ सकता था। वो जो करते थे, वो बड़ा सीधा था - कि लोगों की सेवा करना भगवान की सेवा करने जैसा है।"
चित्रदुर्गा स्थित मुर्गाराजेंद्र मठ के डॉक्टर शिवमूर्ति मुरूगा शरनु स्वामीजी ने कहा, "उनके मन में कभी भी जाति को लेकर कोई दुर्भावना नहीं रही। उन्होंने सबके लिए खाने का इंतजाम किया, खास तौर से बच्चों के लिए, और उन्हें ज्ञान अर्जित करने और समाज को लेकर जागरुक होने के लिए प्रोत्साहित किया।" दर्गा कहते हैं, "केवल अलग जातियों से ही नहीं, अलग धर्मों से भी, जैसे मुसलमानों के बच्चों ने भी उनके आवासीय स्कूलों में पढ़ाई की।"
डॉक्टर जामदार और दर्गा ने कहा कि स्वामीजी ने "केवल बासव की विचारधारा के अनुरूप जीवन जिया।"रमजान दर्गा ने कहा, "बासव विचारधारा ने सभी जाति और नस्ल की व्यवस्था को नकार दिया। वो वैदिक व्यवस्था के ठीक उलट है जो जाति व्यवस्था को मानती है। बासव समानतावादी थे। और स्वामीजी ने बासव की सोच वाले समाज को बनाने के लिए काम किया।"
डॉक्टर जामदार कहते हैं, "आठ दशकों तक उन्होंने बच्चों को मुफ़्त भोजन और मुफ़्त शिक्षा दी। उनके संस्थानों में तीन हज़ार छात्र पढ़ा करते थे। आज वहाँ आठ से नौ हज़ार छात्र पढ़ते हैं। उनके छात्र पूरी दुनिया में फैले हैं। एक अनुमान है कि उनके संस्थान से लगभग 10 लाख छात्रों ने पढ़ाई की है। "