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Sheetala Ashtami 2020: जानिए कब है शीतला अष्टमी व्रत, क्या है इसकी व्रत विधि

Fri, 13 Mar 2020 07:20 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
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शीतला अष्टमी 2020
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शीतला अष्टमी व्रत धार्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण व्रत होता है। यह व्रत माता शीतला को समर्पित है। यह व्रत होली के आठवें दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रति वर्ष शीतला अष्टमी का व्रत चैत्र माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है। इस व्रत को बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं इस बार शीतला अष्टमी व्रत कब है और इस महत्वपूर्ण व्रत की विधि क्या है?

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शीतला अष्टमी व्रत (Sheetala Ashtami 2020) कब है? 
इस साल चैत्र माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 16 मार्च को है। इसलिए शीतला अष्टमी व्रत 16 मार्च 2020 को है। 

कौन है शीतला माता?
शीतला माता कौन हैं? यह व्रत इन्हें क्यों समर्पित है? ऐसे कुछ सवाल आपके जेहन में होंगे। इन सवालों का जवाब हमें हिन्दू पौराणिक शास्त्रों में मिलता है। स्कंद पुराण में माता शीतला का वर्णन है, जिसमें उन्हें चेचक जैसे रोगों की देवी बताया गया है। उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि माता शीतला अपने हाथों में कलश, सूप, झाडू और नीम के पत्ते धारण किए हुए हैं। वे गर्दभ की सवारी किए हुए हैं। शीतला माता के संग ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणुनाशक जल है।

शीतला अष्टमी व्रत विधि
  • प्रातः जल्दी उठें और सूर्योदय से पहले स्नान करें।
  • शीतला माता का स्मरण करें। 
  • व्रत का संकल्प लें। शीतलाष्टक का पाठ करें।
  • देवी-देवताओं को प्रसाद चढ़ाएं।
  • प्रसाद में दही, राबड़ी, गुड़ और कई अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल करें।
  • इसके बाद, भक्त बुजुर्ग लोगों से दिव्य आशीर्वाद लेते हैं।
  • निर्धन लोगों को दान-पुण्य का कार्य करें। 
  • शाम को पूजा के बाद व्रत खोलें।
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शीतला अष्टमी व्रत का महत्व
भगवती शीतला की पूजा-अर्चना का विधान भी अनोखा होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए जाते हैं। अष्टमी के दिन बासी पकवान ही देवी को नैवेद्ध के रूप में समर्पित किए जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार आज भी अष्टमी के दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और सभी भक्त ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद के रूप में बासी भोजन का ही आनंद लेते हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है, इसलिए अब यहां से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।
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