षटतिला एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाला एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत है, जिसे भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है और आत्मा की शुद्धि के साथ मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यह एकादशी केवल व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दान, सेवा और भक्ति का संगम है जो भक्त को आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। मान्यता है कि षटतिला एकादशी पर भगवान विष्णु स्वयं भक्तों के समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें सुख, शांति और अक्षय पुण्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
यह व्रत न केवल आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है, बल्कि शरीर और मन को शुद्ध करने का माध्यम भी है। पदमपुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व बताते हुए कहते हैं कि हे नृपश्रेष्ठ! माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला' या 'पापहारिणी'के नाम से विख्यात है, जो समस्त पापों का नाश करती है। जितना पुण्य कन्यादान और हजारों वर्षों की तपस्या और स्वर्ण दान से मिलता है, उससे अधिक फल षटतिला एकादशी करने से मिलता है। इस एकादशी का व्रत परिवार में सुख-शांति,समृद्धि और जीवन में सकारात्मकता लाने में सहायक होता है।
ऐसे करें षटतिला एकादशी पर श्रीहरि की पूजा
इस दिन जल में तिल और गंगाजल डालकर स्नान करके पवित्र होकर शुद्ध भाव से देवाधिदेव श्री विष्णु भगवान का स्मरण करें। पंचामृत, पुष्प, तुलसी, चन्दन, कपूर, तिल से बने नैवेद्य आदि सामग्री से शंख, चक्र, कमल और गदा धारण करने वाले जगत के पालनहार देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करके आरती करें। कोई भूल हो जाने पर श्रीकृष्ण का नामोच्चारण करें। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन श्रीविष्णु भगवान को पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी सहित अर्घ्य देकर तदुपरांत उनकी स्तुति करनी चाहिए-‘सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीकृष्ण ! आप बड़े दयालु हैं । हम आश्रयहीन जीवों के आप आश्रयदाता होइये। हम संसार समुद्र में डूब रहे हैं, आप हम पर प्रसन्न होइये । कमलनयन ! विश्वभावन ! सुब्रह्मण्य ! महापुरुष ! सबके पूर्वज ! आपको नमस्कार है ! जगत्पते ! मेरा दिया हुआ अर्ध्य आप लक्ष्मीजी के साथ स्वीकार करें ’। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप एवं विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना भी इस दिन विशेष फलदाई है। रात्रि में भगवान के नाम का कीर्तन या भजन करना शुभ माना गया है।
तिल दान का महत्व
मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न तिल और माता लक्ष्मी के प्रिय फल गन्ने के रस से बने गुड के मिष्ठान बनाकर उसे दान करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण को जल का घड़ा, तिल, छाता, जूता और गर्मवस्त्र दान करें। दान करते समय ऐसा कहें- ‘इस दान के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों ।’तिल से बने हुए व्यंजन या तिल से भरा हुआ पात्र दान करने से अंनत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों के अनुसार उन तिलों के बोने पर उनसे जितनी शाखाएं पैदा होती हैं, उतने हजार वर्षों तक दान करने वाला व्यक्ति स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। इस दिन तिल मिश्रित जल से स्नान करें, तिल से होम करें, तिल का उबटन लगाएं, तिल मिलाया हुआ जल पीये, तिल का दान करें और तिल को भोजन के काम में लें। इस प्रकार से छ: कामों में तिल का उपयोग करने के कारण यह एकादशी ‘षटतिला’कहलाती है,जो प्राणी को तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप और भौतिक ताप से दूर रखती है।