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Sharad Purnima 2019: अमृत बरसाती शरद पूर्णिमा की रात

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sharad purnima
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आस्थाएं, मान्यताएं और परंपराएं सदियों से चंद्रमा से जुड़ी हैं। आज भी चंद्र के अर्घ्य और दर्शन-पूजन की बहुत मान्यता है, क्योंकि मानव के लिए अभी भी चंद्रमा एक देवता हैं। मनीषियों ने यह प्रतिपादित किया है कि चंद्रमा की कलाओं के बढ़ने -घटने का प्रभाव मन:स्थिति पर भी पड़ता है और सबसे अधिक तंरगित करती है शरद पूर्णिमा।
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मानव भले ही चांद पर पहुंच गया हो और वहां अपनी बुलंदियों के झंडे गाड़ दिए हों, लेकिन उसकी आस्थाएं, मान्यताएं और परंपराएं युगों-युगों से चांद से जुड़ी हैं। वह आज भी चांद को अर्घ्य देता हैं, दर्शन-पूजन करता है, कुछ मनौती मांगता है, क्योंकि उसने चंद्रमा को देवता माना है। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। मनीषियों ने यह प्रतिपादित किया है कि चंद्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने का प्रभाव मन:स्थिति पर भी पड़ता है। सबसे ज्यादा तंरगित करती है विजयादशमी के बाद मनाई जाने वाली शरदपूर्णिमा। शीत ऋतु की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है। 

कहते हैं कि इसी पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं के साथ आकाश में होता है। ये कलाएं हैं- अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, धृति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, विमला, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। वर्षा ऋतु की जरावस्था और शरद ऋतु के बालरूप के संधिकाल के शरद का चंद्र अपनी इन कलाओं के आभा- सौंदर्य से सहज ही मन मोह लेता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रसंग है पूर्णावतार श्रीकृष्ण का महारास। "रास पंचाध्यायी" के अनुसार श्री (धन संपदा), भू (अचल संपत्ति), कीर्ति (यश प्रसिद्धि), इला (वाणी की सम्मोहकता), लीला (आनंद उत्सव), कांति (सौंदर्य और आभा), विद्या (मेधा बुद्धि), विमला (पारदर्शिता), उत्कर्षिणि (प्रेरणा और नियोजन), ज्ञान (नीर- क्षीर विवेक), क्रिया (कर्मण्यता), योग (चित्तलय), प्रहवि (अत्यंतिक विनय), सत्य (यथार्य), इसना (आधिपत्य) व अनुग्रह (उपकार); की कलाओं से गोपियां निधि वन की ओर खींची चली आई थीं। अध्यात्म के तत्ववेत्ता इसे महान घटना मानते हैं। श्रीकृष्ण यों आप्तकाम थे, लेकिन प्रेमदान का यह लीला विलास मनुष्य को अलौकिक आनंद देता है। इस अलौकिक उत्सव की स्मृतियों में अब तो शरद पूर्णिमा पर रासलीला का उत्सव जगह- जगह  बहुत श्रद्धा से मनाया जाता है।

शरद पूर्णिमा की उपादेयता अन्यतम भी मानते हैं। कहा जाता है कि महालक्ष्मी और महर्षि वाल्मीकि का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का अवतरण भी इसी दिन हुआ। नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में लक्ष्मी पृथ्वी का आनंद उठाने भ्रमण के लिए निकलती हैं। इस दौरान जो मनुष्य जागकर इस अमृत बेला में उनकी आराधना करता है, उसे वह अनुग्रहीत करती हैं। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को कोजागरी पूर्णिमा (कौन जाग रहा) भी कहा जाता है। मिथिलांचल में इस दिन महालक्ष्मी की पूजा विधि-विधान से की जाती है। बंगाल और उत्तर भारत में जहां यह उत्सव शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में क्वार पूर्णिमा के रूप में। वहां इस दिन गजलक्ष्मी की पूजा होती है। किसी जमाने में शरद पूर्णिमा पर कौमुदी महोत्सव मनाया जाता था। महाभारत काल में भी इसका जिक्र मिलता है। बौद्ध ग्रंथ 'दीर्घ निकाय' में उल्लेख है कि मगध सम्राट अजातशत्रु शरद पूर्णिमा को पूरी रात भव्य कौमुदी महोत्सव आयोजित करता था। यह मध्ययुग के अत्यंत लोकप्रिय आयोजनों में से एक था।  
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- फोटो : SELF
शरद पूर्णिमा अमृतमयी रात्रि भी मानी गई है। उल्लेख मिलते हैं कि प्राचीन काल में शरद पूर्णिमा की रात वैद्यों द्वारा विभिन्न जड़ी- बूटियों से औषधियां बनाई जाती थीं। मान्यता थी कि शरदपूर्णिमा की चंद्र किरणें अन्न-वनस्पति में औषधीय गुण सींचती हैं। आज भी कुलीन घरों में शरद पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर चांद की रोशनी में रखने का रिवाज है। यह केवल एक परंपरा ही नहीं, बल्कि विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है।           
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