वैदिक ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव का विशेष महत्व होता है। शनिदेव को सभी ग्रहों में कर्मफलदाता और न्यायाधिपति ग्रह माना गया है। वहीं शनि का नाम आते ही लोगों के मन अक्सर डर बैठ जाता है कि कहीं शनि की अशुभ द्दष्टि उनके ऊपर न पड़ जाए। शनि की चाल में जब भी बदलाव होता है तब किसी व्यक्ति के ऊपर शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या जरूर शुरू हो जाती है। शनि सभी ग्रहों में सबसे मंद चाल से चलने वाले ग्रह हैं जिस कारण इनका शुभ या अशुभ प्रभाव जातकों के जीवन पर भी काफी देर तक रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अच्छे कर्म करने पर शनिदेव प्रसन्न होते हैं वहीं बुरे कर्म करने पर शनिदेव जातकों को दंड भी देते हैं। शनिदेव की कृपा पाने के लिए शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करते हुए तरह-तरह के उपाय किए जाते हैं। शास्त्रों में शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए और इनके प्रकोप से बचने के लिए शनि स्तोत्र का पाठ करना बहुत लाभकारी बताया गया है।
शनि स्तोत्र के पाठ करने की विधि
शनिदेव अगर किसी जातक पर प्रसन्न हो जाएं तो वे व्यक्ति रंक से राजा बना देते हैं। ऐसे में शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए दशरथकृत शनिस्त्रोत का पाठ करना चाहिए। शनि स्तोत्र का पाठ शनिवार के दिन करना बहुत लाभकारी होता है। ऐसे में शनिवार के दिन सुबह जल्दी उठकर और स्नान करके साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। फिर अपने घर के पास स्थिति शनि मंदिर जाकर शनिदेव को सरसों का तेल जलाकर उन्हें दीपक अर्पित करें। फिर इसके बाद ध्यान लगाकर दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें।
शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय
शनिदेव के दिव्य मंत्र ‘ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:’ का जप करने से प्राणी भयमुक्त रहता है। शनिदेव की प्रसन्नता के लिए जातक को शनिवार के दिन व्रत रखना चाहिए एवं गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए,ऐसा करने से जीवन में आए संकट दूर होने लगते हैं। शनिदेव, हनुमानजी की पूजा करने वालों से सदैव प्रसन्न रहते हैं,इसलिए इनकी कृपा पाने के लिए शनि पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा करनी चाहिए।
दशरथकृत शनि स्तोत्र
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।।
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च।।
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते।।
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।
प्रसाद कुरु मे सौरे वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:।।