सावन माह हो या अन्य कोई पर्व। भगवान शंकर की आराधना करने के पहले यह समझना जरूरी है कि उन्हें देवाधिदेव क्यों माना गया है? जब इस गहराई पर विचार किया जाएगा, तब स्वतः स्पष्ट होगा कि भगवान शंकर सहजता एवं सरलता के देवता हैं। उनकी पूजा और आराधना स्थूल सुख के लिए नहीं, बल्कि आंतरिक सौख्य एवं आह्लाद के लिए की जाए, तो श्रेष्ठ होगा। सिर्फ भगवान शंकर ही ऐसे देवता हैं, जो अपने भक्तों को सिर पर बैठाते हैं।
जब भी भगवान शंकर के शिवलिंग स्वरूप की पूजा होती है, तो जल, अक्षत, फूल और बेलपत्र उन पर चढ़ाया जाता है। महादेव थोड़े से जल और बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं। यदि सांसारिक जीवन में कोई श्रेष्ठ पदधारी न्यूनतम श्रद्धा से प्रसन्न हो जाए, तो समाज उसका ऋणी हो जाता है। जल चढ़ाने का आशय मन की तरलता से भी लिया जाना चाहिए। महादेव के पुत्र भगवान गणेश भी इन्हीं गुणों की वजह से प्रथम देव बन गए।
भारी-भरकम व्यक्तित्व के बावजूद उन्होंने अपना वाहन एक चूहे को बनाया। जबकि सामाजिक जीवन में भारी-भरकम ओहदे वाला व्यक्ति भारी-भरकम वाहन और काफिले के साथ आता जाता है। गणेश जी भी सिर्फ दूब चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं। महादेव की अर्धांगिनी माता पार्वती भी स्तुति में दो अच्छे शब्द बोलने से ही प्रसन्न होती हैं। अमरकथा सुनाने की जब बारी आई, तो महादेव ने सब कुछ त्याग दिया। इसका निहतार्थ यही है कि रसमय जीवन के लिए त्याग भी जरूरी है। भौतिक वस्तुओं के संग्रह में प्रायः जीवन का रस रिक्त हो जाता है।