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उन चार दिनों के लिए महिलाओं को यह व्रत करना जरूरी क्यों?

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शास्त्रों में कहा गया है कि मासिक धर्म के चार दिनों में स्त्री अपवित्र रहती है। इस अवधि में महिलाओं को किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना एवं गृहस्थी के कार्यों से दूर रहना चाहिए।
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मनुस्मृति और भविष्यपुराण में यह भी कहा गया है कि इन चार दिनों में पति-पत्नी को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए साथ शयन नहीं करना चाहिए। अन्यथा परलोक और अगले जन्म में बहुत ही कष्ट का सामना करना पड़ता है।

फिर क्या हुआ जब उस कन्या का विवाह हुआ

भविष्य पुराण में इस संदर्भ में एक कथा का उल्लेख किया गया है। विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक ब्राह्मण रहा करते थे। ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर ब्राह्मण ने अपनी कन्या का विवाह एक सुयोग्य वर के साथ कर दिया।

लेकिन दैवयोग से इसके पति की मृत्यु कुछ दिनों के बाद ही हो गई। ब्राह्मण अपनी कन्या को लेकर परिवार सहित गंगा तट पर चले आए। यहीं कुटिया बनकर इन्होंने अपना जीवन बितान शुरू किया।

जब सो रही थी कन्या हुई ऐसी घटना

एक दिन की बात है ब्राह्मण की कन्या सो रही थी। कन्या की मां ने देखा कि उसकी पुत्री का शरीर कीड़ों से भर गया। वह अपने पति के पास गई और बोली की देखिए हमारी पुत्री का शरीर कीड़ों से भर गया है। आखिर कौन सा पाप किया है इसने जिससे अल्पायु में विधवा हो गई और फिर शरीर में कीड़े पड़ गए।

उत्तंक ने ध्यान लगाकर देखा तो पाया कि उनकी कन्या पूर्व जन्म में भी ब्राह्मण की पुत्री थी। इसने रजस्वला होते भी बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।
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व्रत का प्रभाव और कब है यह व्रत

उत्तंक ने कहा कि अगर हमारी पुत्री अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।

पिता की आज्ञा से ब्राह्मण की पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह अगले जन्म में अटल सौभाग्य एवं अक्षय सुखों को प्राप्त करने में सफल हुई। इह वर्ष यह व्रत 30 अगस्त रविवार के दिन है।
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