मंदिर या किसी तीर्थ स्थान की यात्र जब भी आपने की होगी तो देखा होगा कि कुछ लोग मंदिर के चारों ओर बार-बार घूम रहे हैं। इसे परिक्रमा कहते हैं।
मथुरा के गोवर्धन तीर्थ और कोकिला वन के शनि धाम तीर्थ में अगर आप जाएं तो यहां आपको कई किलोमीटर के पथ पर लोगों को परिक्रमा करते हुए देख सकते हैं।
श्रद्घालु बड़े ही आस्था और विश्वास से परिक्रमा पूरी करते हैं। कुछ लोगों को अपने पीपल और केले के वृक्ष के सामने भी परिक्रमा करते हुए देखा होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लोग परिक्रमा करते क्यों हैं और इसका इतना महत्व क्यों है?
परिक्रमाएं करने का विधान
तीर्थ यात्रा के लिए शास्त्रीय निर्देश यह है कि उसे पद यात्रा के रूप में ही किया जाए। यह परंपरा कई जगह निभती दिखाई देती है। गोवर्धन गिरनार आदि पर्वतों की-ब्रजधाम, प्रयाग पंचकोशी आदि क्षेत्रों की-नर्मदा आदि नदियों की परिक्रमा होती है।
इन्हें पैदल ही किया जाता है। जो लोग दूर नहीं जा सकते, वे विशिष्ट पर्वों पर पीपल, बरगद, आंवला, तुलसी आदि की एक खास संख्या में परिक्रमा कर लेते है। देवालयों की प्रदक्षिणा की जाती है। यज्ञ पूर्णाहुति के समय चार परिक्रमाएं करने का विधान है।
इसलिए माना जाता है कि किसी भी पूजा या तीर्थ यात्रा की पूर्णाहुति तब तक नहीं होती है जब तक परिक्रमा नहीं कर लिया जाए। वर्तमान समय में लोग वाहनों के माध्यम से तीर्य यात्रा पूरी करते हैं जबकि तीर्थयात्रा का नियम पैदल चलने से है। इसलिए तीर्थयात्रा के इस नियम के पालन के लिए भी लोग परिक्रमा करते हैं।
पहले धर्म परायण व्यक्ति छोटी-बड़ी मंडलियां बनाकर तीर्थ यात्रा पर निकलते थे। यात्रा के मार्ग और पड़ाव निश्चित थे। उत्तराखंड में चारों धाम, तिरुमलै, विध्यक्षेत्र, नर्मदास गोमती, गोदावरी, इक्कावन शक्तिपीठ और बारह ज्योतिर्लिंग और चौबीस विष्णुतीर्थ जैसे सैंकड़ों स्थान थे, जहां लोग मंडलियां बनाकर जाते थे। यात्रा की रूप रेखा भी मंडलियां बनाती थी।
मार्ग में जो गांव, बस्तियां, झोंपड़े नगले पुरबे आदि मिलते थे, उनमें रुकते, ठहरते, किसी उपयुक्त स्थान पर रात्रि विश्राम करते थे। जहां रुकना वहां धर्म चर्चा करना-लोगों को कथा सुनाना, यह क्रम प्रातः से सायंकाल तक चलता था। रात्रि पड़ाव में भी कथा कीर्तन, सत्संग का क्रम बनता था।
तीर्थ यात्रा का महत्व
तीर्थ स्थानों का महत्व इसलिए है कि वे तीर्थ यात्रा परंपरा को गतिशील रखने में सक्षम हैं। महत्वपूर्ण अनुदानों को वे तीर्थ संचालक ऋषियों से प्राप्त करते है। उन ऋषियों के आरण्यक तीर्थों में चलते हैं। तीर्थों में सामान्य यात्री-नागरिक तो पहुंचते ही थे। धर्म प्रचारक मंडलियों को भी वहां से बहुत कुछ मिलता था।
बड़े तीर्थ बड़े केंद्र थे-उन्हें राजधानियां कह सकते हैं। छोटे तीर्थ जिले तहसील आदि की भूमिका निभाते थे। उनके कार्यक्षेत्र बंटे हुए थे। इन क्षेत्रों को मंडल कहते थे। मंडलेश्वर या मंडलाधीश मंडलों में धर्म चेतना बनाए रहने, बढ़ाते चलने का उत्तरादयित्व संभालते थे। इनके केंद्र संस्थान तीर्थों के नाम से जाने जाते थे।
इन्हीं केंद्रों के माध्यम से देश भर में विश्व भर में धर्म चेतना सुव्यवस्थित रखने का महान कार्य संपादित होता था। इस सूझ-बूझ और सुव्यवस्था को देखते हुए तीर्थ स्थापना करने वाले महान तत्वज्ञानियों की दूरदर्शिता के सम्मुख ही श्रद्धा से प्रत्येक विचार शील का मस्तक झुक जाता है।