पूरे महीने पृथ्वी भ्रमण करने के बाद शिव श्रावण की यात्रा का अंतिम दिन मनाएंगे। पूर्णिमा के दिन जब चंद्रमा अपनी संपूर्ण कलाओं और सहस्रों शीतल रश्मियों से संसार को आच्छादित कर देते हैं, लक्ष्मी पाताल लोक में बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपने पति विष्णु को मुक्त करा लेती हैं तो इसी दिन कैलास की ओर प्रस्थान करती हैं।
इस दिन रुद्राभिषेक करना, पंचाक्षर मंत्र का जाप, जप-तप, पूजा-पाठ और दन पुण्य विशेष महत्व रहता है। वेदपाठी ब्राह्मणों के लिए यह दिन श्रावणी उपाकर्म के लिए नियत हैं।
इस दिन संपन्न होने वाले आध्यात्मिक विधान में षट्कर्म, तीर्थों का आह्वान, संकल्प, पंचगव्य स्नान सहित शिखा सिंचन, नवीन यज्ञोपवीत धारण और बाद में विष्णु पूजन किया जाता है।