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Chinnamasta Devi: कौन है मां छिन्नमस्ता, आखिर क्यों है इनकी पूजा का विशेष महत्व?

Sat, 20 Sep 2025 01:43 PM IST
शिखर बरनवाल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दस महाविद्याओं में से एक मां छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत उग्र है, जिसमें वे अपना ही कटा सिर हाथ में धारण करती हैं। यह रूप अहंकार के विनाश और परम त्याग का प्रतीक है। आइए इस लेख में इन देवी माता के बारे में विस्तार से जानते हैं।
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मां छिन्नमस्ता - फोटो : chinnamasta.com
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विस्तार
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Who is Maa Chinnamasta? सनातन धर्म में दस महाविद्याओं की साधना को अत्यंत शक्तिशाली माना गया है, और इन्हीं में से एक हैं मां छिन्नमस्ता। मां के नाम के जैसे ही उनका स्वरूप भी भयावह प्रतीत होता है, जिसमें वे स्वयं अपने एक हाथ में अपना ही कटा हुआ मस्तक धारण की हुई हैं। उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएं निकलती हैं, जिनमें से एक को वे स्वयं ग्रहण करती हैं और बाकी दो धाराएं उनकी सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी को तृप्त करती हैं। यह उग्र स्वरूप देखकर भले ही मन में भय उत्पन्न हो, लेकिन इसका आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। मां छिन्नमस्ता का यह रूप जीवन और मृत्यु के चक्र, आत्म-बलिदान, ब्रह्मांडीय ऊर्जा के पोषण और अहंकार के विनाश का प्रतीक है। वो एक प्रमुख तांत्रिक देवी हैं जिनकी साधना अत्यंत कठिन मानी जाती है, लेकिन यह साधक को सभी प्रकार के भय से मुक्त कर देती है।
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देवी की पौराणिक कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां पार्वती अपनी सहचरियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान कर रही थीं। स्नान के बाद उनकी सहचरियों को तीव्र भूख लगी और वे भोजन के लिए देवी से प्रार्थना करने लगीं। अपनी सखियों को भूख से व्याकुल देख, परम करुणामयी देवी ने तुरंत अपने खड्ग से अपना ही सिर काट लिया और अपने रक्त से उनकी भूख शांत की। इसी आत्म-बलिदान और परम त्याग के कारण वे छिन्नमस्ता कहलाईं।

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पूजा का तांत्रिक महत्व
मां छिन्नमस्ता की साधना मुख्य रूप से तांत्रिकों और साधकों द्वारा की जाती है। माना जाता है कि इनकी उपासना से साधक की कुंडलिनी शक्ति शीघ्र जागृत होती है। देवी की पूजा शत्रुओं पर विजय, मुकदमे में सफलता, और सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति पाने के लिए की जाती है। इनकी कृपा से साधक को अष्ट-सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है और वह जीवन-मरण के चक्र से परे हो जाता है।

आत्म-बलिदान की प्रतीक हैं ये देवी
देवी का अपने ही हाथों से अपना मस्तक काटना अहंकार और भौतिक शरीर से परे होने का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह दर्शाता है कि असली पहचान आत्मा है, न कि यह नश्वर शरीर। गले से निकलती रक्त की तीन धाराएं इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का प्रतीक हैं, जो जीवन ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाती हैं। यह रूप दिखाता है कि वही जीवन देने वाली और उसका संहार करने वाली भी हैं।

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प्रमुख सिद्धपीठ
झारखंड के रजरप्पा में स्थित मां छिन्नमस्ता का मंदिर विश्व प्रसिद्ध है, जो एक प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है। यहां दामोदर और भैरवी नदी के संगम पर स्थित मंदिर में हजारों श्रद्धालु और तांत्रिक साधना के लिए आते हैं। माना जाता है कि यहां मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है। देवी का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि परोपकार और त्याग ही सर्वोच्च धर्म है।
 
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