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पीएम मोदी ने की मां नर्मदा की पूजा, जानिए क्या हैं इस नदी का पौराणिक महत्व?

Tue, 17 Sep 2019 01:27 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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मोदी - फोटो : ani
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंगलवार,17 सितंबर को 69वां जन्मदिन है। इस दौरान उन्होंने सरदार सरोवर डैम में नर्मदा नदी की पूजा-अर्चना की। आइए जानते हैं नर्मदा नदी का पौराणिक महत्व

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नर्मदा मध्य भारत की और भारतीय उपमहाद्वीप की पांचवीं सबसे लंबी नदी है। इसे रेवा के नाम से भी जाना जाता है। मध्य प्रदेश में इसे "मध्य प्रदेश की जीवन रेखा" भी कहा जाता है। मैकल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है और पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है। 

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धार्मिक कथाओं के अनुसार कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया। इसकी प्रेम-कथा लोकगीतों और लोककथाओं में अलग-अलग तो मिलती है परंतु हर कथा का अंत एक ही है। वही की शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ प्रेम-संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह हमेशा के लिए मोड़ लिया और विपरीत दिशा में चल पड़ीं, इसलिए नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती हुई दिखाई देती है।

मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा का वर्णन इस प्रकार है- कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परंतु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।
 
कथा 1
नर्मदा और शोणभद्र का विवाह होने वाला था। विवाह से ठीक पहले नर्मदा को पता चला कि शोणभद्र उसकी दासी जुहिला से प्रेम करता है। नर्मदा यह सहन ना कर सकी और विवाह मंडप से उठकर उलटी दिशा में चली गई। शोण भद्र को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह नर्मदा के पीछे भागा लेकिन नर्मदा नहीं लौटी।
मान्यता है की आज भी नर्मदा एक बिंदू विशेष से शोण भद्र से अलग होती दिखाई देती है। कथाओं अनुसार ग्रहों के विशेष मेल पर स्वयं गंगा नदी भी यहां स्नान करने आती है। इस नदी को गंगा से भी पवित्र माना गया हैं। 


कथा 2
राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल की पुत्री थी। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ करनें का निश्चय किया जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्पों को उनकी पुत्री के लिए लाएगा। राजकुमार शोणभद्र गुलबकावली के फूल ले आए और उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हो गया। विवाह के कुछ दिन पूर्व नर्मदा ने अपनी दासी जुहिला के हाथों राजकुमार के लिए प्रेम संदेश भेजा। राजकुमार ने दासी को नर्मदा समझ लिया और दासी की नियत में भी खोट आ गया। राजकुमार के प्रणय-निवेदन को वह ठुकरा ना सकी। दासी जुहिला के वापस नहीं आने पर वह स्वयं चल पड़ी शोणभद्र से मिलने। वहां पहुंचने पर शोणभद्र और जुहिला को साथ देखकर वह खुद को अपमानित महसूस करने लगी। तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी। स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर कभी नहीं लौटी। 

कथा 3  
धार्मिक कथाओं अनुसार कई वर्षों पहले नर्मदा जी नदी बनकर जन्मीं और शोणभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों का बचपन साथ व्यतीत हुआ। दोनों किशोर हुए तो लगाव बढ़ने लगा। एक दूसरे को वचन दिया कभी साथ नहीं छोड़ेंगे। परंतु नर्मदा की साथी जुहिला ने अपनी अदाओं से सोनभद्र को भी मोह लिया और वह अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। तब नर्मदा जी ने हमेशा कुंवारी रहने का प्रण लिया और युवावस्था में ही सन्यासिनी बन गई। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं नर्मदा का करूण विलाप सुनाई पड़ता है। 

नर्मदा ने बंगाल सागर की यात्रा छोड़ी और अरब सागर की ओर दौड़ीं। हमारे देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन नर्मदा का मिलन अरब सागर में होता है।

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