दुर्वासा ऋषि माता अनुसूया और ऋषि अत्रि के पुत्र थे। ऋषि दुर्वासा के संदर्भ में कहा जाता है कि वे सतयुग, द्वापर युग और त्रेता युग तीनों युगों में उपस्थित थे। ऋषि दुर्वासा अत्यंत बुद्धिजीवी थे और उन्होंने कई ऋचाओं की रचना की थी। ऋषि दुर्वासा अपने क्रोध के कारण जाने जाते थे। ऋषि दुर्वासा भगवान शिव के पुत्र कहलाते हैं। ऋषि दुर्वासा की उत्पत्ति क्रोध के कारण हुई थी। पौराणिक ग्रंथों में ऋषि दुर्वासा के जन्म की कथा का उल्लेख मिलता है। आइए जानते हैं ऋषि दुर्वासा कौन थे और उनका जन्म कैसे हुआ था।
कैसे हुई ऋषि दुर्वासा की उत्पत्ति
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय माता पार्वती भगवान भोलेनाथ के साथ एकाकी जीवन व्यतीत कर रही थीं,तभी अचानक से देवताओं ने आकार उनके एकांतवास वास में विघ्न डाल दिया। इस वजह से भगवान शिव का क्रोध चरम पर पहुंच गया। भोलेनाथ का क्रोध देखकर सभी देवता भयभीत हो गए। कथा के अनुसार माता अनुसूया भोलेनाथ और माता पार्वती के दर्श के लिए कैसलाश पहुंची तब पार्वती मां ने शिवजी को शांत कराने का प्रयास किया। भोलेनाथ शांत तो हो गए लेकिन उनके क्रोध से जन्मी ऊर्जा कैलाश में इधर-उधर टकराकर कैलाश का ही नुकसान करने लगी। तब भगवान शिव ने बताया कि वह इस ऊर्जा को पुनः अपने अंदर नहीं समा सकते हैं क्योंकि यह ऊर्जा उनके तीसरे नेत्र से निकली है और उनका तीसरा नेत्र अगर दोबारा खुला तो उससे सृष्टि को और भी नुकसान होगा।
जब मटा अनुसूया ने यह बात सुनी तब उन्होंने महादेव से आज्ञा मांगी कि वह अपने तपोबल से उनकी इस क्रोध ऊर्जा को अपने भीतर धारण कर सकती हैं। महादेव ने भी माता अनुसूया को आज्ञा प्रदान की जिसके बाद माता अनुसूया ने इस ऊर्जा को अपने गर्भ में धारण किया। माता अनुसूया ने क्रोध ऊर्जा को गर्भ में धारण किया था इसी कारण से महादेव के क्रोध से ऋषि दुर्वासा का जन्म हुआ और क्रोधाग्नि से प्रकट होने के कारण उनके स्वभाव में अत्यंत क्रोध समाहित हो गया।
अत्यंत क्रोधी थे ऋषि दुर्वासा
ऋषि दुर्वासा को अत्यधिक क्रोध आता था। वे अपने क्रोध में किसी को भी श्राप दे देते थे, इसलिए सभी देवता भी उनका आदर करते थे। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, महाभारत में दुर्वासा ऋषि के मंत्र से ही कुंती ने सूर्यपुत्र कर्ण को जन्म दिया था। वहीं, रामायण काल में लक्ष्मण की मृत्यु का कारण भी ऋषि दुर्वासा को ही माना जाता है।