परशुराम जी भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। इनके पिता जमदग्नि ऋषि भृगुवंशी ऋचीक ऋषि जी के पुत्र थे तथा उनकी गणना सप्तऋषियों में होती है। भगवान परशुरामजी ने ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर न केवल वेद शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया, अपितु क्षत्रिय स्वभाव को धारण करते हुए शस्त्रों को भी धारण किया तथा इससे वह समस्त सनातन जगत के आराध्य तथा समस्त शस्त्रों एवं शास्त्रों के ज्ञाता कहलाए।
धर्म की स्थापना के लिए भगवान परशुराम जी ने प्रत्येक युग के किसी न किसी कालखंड में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी भगवान परशुराम जी महेन्द्र पर्वत पर समाधिस्थ हैं। अष्ट चिरंजीवियों में शामिल अजर-अमर अविनाशी भगवान परशुराम जी अपने भक्तों को दर्शन प्रदान करते हैं। कल्कि पुराण के अनुसार ये भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। वे ही भगवान कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे।
भगवान परशुराम जी ने सामाजिक न्याय तथा समानता की स्थापना के उद्देश्य से तथा समाज के शोषित तथा पीड़ित वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाया। उनकी महान पितृ-मातृ भक्ति वन्दनीय है। उन्होंने समस्त पृथ्वी को दान स्वरूप कश्यप ऋषि जी को प्रदान किया। कमल लोचन जमदग्नि नन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तर में सप्तर्षियों के मंडल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे।
परशुराम का परिवार एवं कुल :
- परशुराम सप्तऋषि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे पुत्र हैं।
- ऋषि जमदग्नि के पिता का नाम ऋषि ऋचिका तथा ऋषि ऋचिका, प्रख्यात संत भृगु के पुत्र थे।
- ऋषि भृगु के पिता का नाम च्यावणा था। ऋचिका ऋषि धनुर्वेद तथा युद्धकला में अत्यंत निपुण थे। अपने पूर्वजों की तरह ऋषि जमदग्नि भी युद्ध में कुशल योद्धा थे।
- जमदग्नि के पांचों पुत्रों वासू, विस्वा वासू, ब्रिहुध्यनु, बृत्वकन्व तथा परशुराम में परशुराम ही सबसे कुशल एवं निपुण योद्धा एवं सभी प्रकार से युद्धकला में दक्ष थे।
- परशुराम भारद्वाज एवं कश्यप गोत्र के कुलगुरु भी माने जाते हैं।
भगवान परशुराम के अस्त्र
परशुराम का मुख्य अस्त्र कुल्हाड़ी माना जाता है। इसे फारसा, परशु भी कहा जाता है। परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे तो थे, परंतु उनमे युद्ध आदि में अधिक रुचि थी। इसीलिए उनके पूर्वज च्यावणा, भृगु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की आज्ञा दी। अपने पूर्वजों कि आज्ञा से परशुराम ने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा तब परशुराम ने हाथ जोड़कर शिवजी की वंदना करते हुए शिवजी से दिव्य अस्त्र तथा युद्ध में निपुण होने कि कला का वर मांगा। शिवजी ने परशुराम को युद्धकला में निपुणता के लिए उन्हें तीर्थ यात्रा की आज्ञा दी। तब परशुराम ने उड़ीसा के महेन्द्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर शिवजी की कठिन एवं घोर तपस्या की।
उनकी इस तपस्या से एक बार फिर शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने परशुराम को वरदान देते हुए कहा कि परशुराम का जन्म धरती के राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ है इसीलिए भगवान शिवजी ने परशुराम को, देवताओं के सभी शत्रु, दैत्य, राक्षस तथा दानवों को मारने में सक्षमता का वरदान दिया। परशुराम युद्धकला में निपुण थे। ऐसी मान्यता है कि धरती पर रहने वालों में परशुराम और रावण के पुत्र इंद्रजीत को ही सबसे खतरनाक, अद्वितीय और शक्तिशाली अस्त्र ब्रह्मांड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र तथा पशुपत अस्त्र प्राप्त थे।परशुराम शिवजी के उपासक थे। उन्होंने सबसे कठिन युद्धकला “कलारिपायट्टू”की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की। शिवजी की कृपा से उन्हें कई देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्राप्त हुए थे। “विजया” उनका धनुष कमान था, जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था।