Parshuram Dwadashi 2020: परशुराम द्वादशी व्रत 4 मई को है। यह व्रत भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी को समर्पित है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रति वर्ष परशुराम द्वादशी व्रत वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भक्त एक कठोर व्रत का पालन करते हैं। शास्त्रों में इस व्रत को बहुत ही फलदायी माना गया है। मान्यता के अनुसार, यदि कोई वैवाहिक दंपत्ति संतान की कामना रखते हैं तो उन्हें परशुराम द्वादशी का व्रत करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु ने माता धरती के आग्रह पर धरती पर फैले अधर्म का नाश करने के लिए परशुराम के रूप में अवतार लिया।
परशुराम द्वादशी की पूजा विधि
सुबह जल्दी उठें और फिर स्नान ध्यान कर व्रत का संकल्प लें।
इसके बाद भगवान परशुराम की आराधना करें।
पूरे दिन व्रत निराहार रहें।
शाम को आरती अर्चना करने के बाद फलाहार ग्रहण करें।
इसके बाद अगले दिन फिर से पूजा करने के उपरांत भोजन ग्रहण करें।
भगवान परशुराम का जीवन
भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। जब उनका जन्म हुआ था तो आकाश मंडल में छह ग्रहों का उच्च योग बना हुआ था। तब उनके पिता और सप्त ऋषि में सम्मिलित ऋषि जमदग्नि को पता चल गया था कि उनका बालक बेहद पराक्रमी होगा।
हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन ने अपने बल और घमंड के कारण लगातार ब्राह्राणों और ऋषियों पर अत्याचार कर रहा था। प्राचीन कथा और कहानियों के अनुसार एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी सेना सहित भगवान परशुराम के पिता जमदग्रि मुनि के आश्रम में पहुंचा। जमदग्रि मुनि ने सेना का स्वागत और खान पान की व्यवस्था अपने आश्रम में की।
मुनि ने आश्रम की चमत्कारी कामधेनु गाय के दूध से समस्त सैनिकों की भूख शांत की। कामधेनु गाय के चमत्कार से प्रभावित होकर उसके मन में लालच पैदा हो गई। इसके बाद जमदग्रि मुनि से कामधेनु गाय को उसने बलपूर्वक छीन लिया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया।
सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने बदला लेने के लिए परशुराम के पिता का वध कर दिया और पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।